महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरंतप! आप जिसके शत्रु होंगे, वह गन्धर्व हो या असुर, आपके कुपित होनेपर कभी चिरजीवी नहीं हो सकता ।। ८३ ।। एतावानत्र दोषो हि नान्यः कश्चन् पार्थिव । एतज्जानीहि भद्रं ते दानादाने परंतप ।। ८४ ।। पृथ्वीनाथ! बस, इस विवाहमें इतना ही दोष है, दूसरा कोई नहीं। परंतप! आपका कल्याण हो, कन्याको देने या न देनेमें केवल यही दोष विचारणीय है; इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें ।। ८४ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु गाङ्गेयस्तद्युक्तं प्रत्यभाषत । शृण्वतां भूमिपालानां पितुरर्थाय भारत ।। ८५ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! निषादके ऐसा कहनेपर गंगानन्दन देवव्रतने पिताके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये सब राजाओंके सुनते-सुनते यह उचित उत्तर दिया— ।। ८५ ।। इदं मे व्रतमादत्स्व सत्यं सत्यवतां वर । नैव जातो न वाजात ईदृशं वक्तुमुत्सहेत् ।। ८६ ।। ‘सत्यवानोंमें श्रेष्ठ निषादराज! मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा सुनो और ग्रहण करो। ऐसी बात कह सकनेवाला कोई मनुष्य न अबतक पैदा हुआ है और न आगे पैदा होगा ।। ८६ ।। एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वमनुभाषसे । योऽस्यां जनिष्यते पुत्रः स नो राजा भविष्यति ।। ८७ ।। ‘लो, तुम जो कुछ चाहते या कहते हो, वैसा ही करूँगा। इस सत्यवतीके गर्भसे जो पुत्र पैदा होगा, वही हमारा राजा बनेगा’ ।। ८७ ।।