महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘सत्यधर्मपरायण राजकुमार! आपने सत्यवतीके हितके लिये इन राजाओंके बीचमें जो प्रतिज्ञा की है, वह आपके ही योग्य है ॥ ९१ ॥ नान्यथा तन्महाबाहो संशयोऽत्र न कश्चन । तवापत्यं भवेद् यत् तु तत्र नः संशयो महान् ॥ ९२ ॥ ‘महाबाहो! वह टल नहीं सकती; उसके विषयमें मुझे कोई संदेह नहीं है, परंतु आपका जो पुत्र होगा, वह शायद इस प्रतिज्ञापर दृढ़ न रहे, यही हमारे मनमें बड़ा भारी संशय है’ ॥ ९२ ॥
वैशम्पायन उवाच
तस्यैतन्मतमाज्ञाय सत्यधर्मपरायणः । प्रत्यजानात् तदा राजन् पितुः प्रियचिकीर्षया ॥ ९३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! निषादराजके इस अभिप्रायको समझकर सत्यधर्ममें तत्पर रहनेवाले कुमार देवव्रतने उस समय पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे यह कठोर प्रतिज्ञा की ॥ ९३ ॥
गाङ्गेय उवाच
दाशराज निबोधेदं वचनं मे नरोत्तम । (ऋषयो वाथवा देवा भूतान्यन्तर्हितानि च । यानि यानीह शृण्वन्तु नास्ति वक्ता हि मत्समः ॥ इदं वचनमादत्स्व सत्येन मम जल्पतः ।) शृण्वतां भूमिपालानां यद् ब्रवीमि पितुः कृते ॥ ९४ ॥ भीष्मने कहा— नरश्रेष्ठ निषादराज! मेरी यह बात सुनो। जो-जो ऋषि, देवता एवं अन्तरिक्षके प्राणी यहाँ हों, वे सब भी सुनें। मेरे समान वचन देनेवाला दूसरा नहीं है। निषाद! मैं सत्य कहता हूँ, पिताके हितके लिये सब भूमिपालोंके सुनते हुए मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरी इस बातको समझो ॥ ९४ ॥ राज्यं तावत् पूर्वमेव मया त्यक्तं नराधिपाः । अपत्यहेतोरपि च करिष्येऽद्य विनिश्चयम् ॥ ९५ ॥ राजाओ! राज्य तो मैंने पहले ही छोड़ दिया है; अब संतानके लिये भी अटल निश्चय कर रहा हूँ ॥ ९५ ॥ अद्यप्रभृति मे दाश ब्रह्मचर्यं भविष्यति । अपुत्रस्यापि मे लोका भविष्यन्त्यक्षया दिवि ॥ ९६ ॥ निषादराज! आजसे मेरा आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत चलता रहेगा। मेरे पुत्र न होनेपर भी स्वर्गमें मुझे अक्षय लोक प्राप्त होंगे ॥ ९६ ॥ (न हि जन्मप्रभृत्युक्तं मम किंचिदिहानृतम् ।