महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनुष्यं न हि मेने स कञ्चित् सदृशमात्मनः ॥ ६ ॥ चित्रांगद अपने शौर्यके घमंडमें आकर सब राजाओंका तिरस्कार करने लगे। वे किसी भी मनुष्यको अपने समान नहीं मानते थे ॥ ६ ॥ तं क्षिपन्तं सुरांश्चैव मनुष्यानसुरांस्तथा । गन्धर्वराजो बलवांस्तुल्यनामाभ्ययात् तदा ॥ ७ ॥ मनुष्योंपर ही नहीं, वे देवताओं तथा असुरोंपर भी आक्षेप करते थे। तब एक दिन उन्हींके समान नामवाला महाबली गन्धर्वराज चित्रांगद उनके पास आया ॥ ७ ॥
(गन्धर्व उवाच त्वं वै सदृशनामासि युद्धं देहि नृपात्मज । नाम चान्यत् प्रगृणीष्व यदि युद्धं न दास्यसि ॥ त्वयाहं युद्धमिच्छामि त्वत्सकाशात् तु नामतः । आगतोऽस्मि वृथाभाष्यो न गच्छेन्नामतो यथा ॥) गन्धर्वने कहा— राजकुमार! तुम मेरे सदृश नाम धारण करते हो, अतः मुझे युद्धका अवसर दो और यदि यह न कर सको तो अपना दूसरा नाम रख लो। मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूँ। नामकी एकताके कारण ही मैं तुम्हारे निकट आया हूँ। मेरे नामद्वारा व्यर्थ पुकारा जानेवाला मनुष्य मेरे सामनेसे सकुशल नहीं जा सकता।
तेनास्य सुमहद् युद्धं कुरुक्षेत्रे बभूव ह । तयोर्बलवतोस्तत्र गन्धर्वकुरुमुख्ययोः । नद्यास्तीरे सरस्वत्याः समास्तिस्रोऽभवद् रणः ॥ ८ ॥ तस्मिन् विमर्दे तुमुले शस्त्रवर्षसमाकुले । मायाधिकोऽवधीद् वीरं गन्धर्वः कुरुसत्तमम् ॥ ९ ॥ तदनन्तर उसके साथ कुरुक्षेत्रमें राजा चित्रांगदका बड़ा भारी युद्ध हुआ। गन्धर्वराज और कुरुराज दोनों ही बड़े बलवान् थे। उनमें सरस्वती नदीके तटपर तीन वर्षोंतक युद्ध होता रहा। अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षासे व्याप्त उस घमासान युद्धमें मायामें बढ़े-चढ़े हुए गन्धर्वने कुरुश्रेष्ठ वीर चित्रांगदका वध कर डाला ॥ ८-९ ॥
स हत्वा तु नरश्रेष्ठं चित्राङ्गदमरिंदमम् । अन्ताय कृत्वा गन्धर्वो दिवमाचक्रमे ततः ॥ १० ॥ शत्रुओंका दमन करनेवाले नरश्रेष्ठ चित्रांगदको मारकर युद्ध समाप्त करके वह गन्धर्व स्वर्गलोकमें चला गया ॥ १० ॥
तस्मिन् पुरुषशार्दूले निहते भूरितेजसि । भीष्मः शान्तनवो राजा प्रेतकार्याण्यकारयत् ॥ ११ ॥