भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 765, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 765

अभ्यगच्छदमेयात्मा भीष्मं शान्तनवं रणे । वारणं जघने भिन्दन् दन्ताभ्यामपरो यथा ।। ३५ ।। वासितामनुसम्प्राप्तो यूथपो बलिनां वरः । स्त्रीकामस्तिष्ठ तिष्ठेति भीष्ममाह स पार्थिवः ।। ३६ ।। शाल्वराजो महाबाहुरमर्षेण प्रचोदितः । ततः सः पुरुषव्याघ्रो भीष्मः परबलार्दनः ।। ३७ ।। तद्वाक्याकुलितः क्रोधाद् विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् । विततेषुधनुष्पाणिर्विकुञ्चितललाटभृत् ।। ३८ ।। फिर भीष्मजीने भी अपना पराक्रम प्रकट करते हुए प्रत्येक योद्धाको दो-दो बाणोंसे बींध डाला। बाणों और शक्तियोंसे व्याप्त उनका वह तुमुल युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर जान पड़ता था। उस समरांगणमें भीष्मने लोकविख्यात वीरोंके देखते-देखते उनके धनुष, ध्वजाके अग्रभाग, कवच और मस्तक सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें काट गिराये। युद्धमें रथसे विचरनेवाले भीष्मजीकी दूसरे वीरोंसे बढ़कर हाथकी फुर्ती और आत्मरक्षा आदिकी शत्रुओंने भी सराहना की। सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भरतकुलभूषण भीष्मजीने उन सब योद्धाओंको जीतकर कन्याओंको साथ ले भरतवंशियोंकी राजधानी हस्तिनापुरको प्रस्थान किया। राजन्! तब महारथी शाल्वराजने पीछेसे आकर युद्धके लिये शान्तनुनन्दन भीष्मपर आक्रमण किया। शाल्वके शारीरिक बलकी कोई सीमा नहीं थी। जैसे हथिनीके पीछे लगे हुए एक गजराजके पृष्ठभागमें उसीका पीछा करनेवाला दूसरा यूथपति दाँतोंसे प्रहार करके उसे विदीर्ण करना चाहता है, उसी प्रकार बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु शाल्वराज स्त्रीको पानेकी इच्छासे ईर्ष्या और क्रोधके वशीभूत हो भीष्मका पीछा करते हुए उनसे बोला—‘अरे ओ! खड़ा रह, खड़ा रह।' तब शत्रुसेनाका संहार करनेवाले पुरुषसिंह भीष्म उसके वचनोंको सुनकर क्रोधसे व्याकुल हो धूमरहित अग्निके समान जलने लगे और हाथमें धनुष-बाण लेकर खड़े हो गये। उनके ललाटमें सिकुड़न आ गयी ।। ३०—३८ ।।

क्षत्रधर्मं समास्थाय व्यपेतभयसम्भ्रमः । निवर्तयामास रथं शाल्वं प्रति महारथः ।। ३९ ।। महारथी भीष्मने क्षत्रिय-धर्मका आश्रय ले भय और घबराहट छोड़कर शाल्वकी ओर अपना रथ लौटाया ।। ३९ ।।

निवर्तमानं तं दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते । प्रेक्षकाः समपद्यन्त भीष्मशाल्वसमागमे ।। ४० ।। उन्हें लौटते देख सब राजा भीष्म और शाल्वके युद्धमें कुछ भाग न लेकर केवल दर्शक बन गये ।। ४० ।।

तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ वासितान्तरे । अन्योन्यमभ्यवर्तेतां बलविक्रमशालिनौ ।। ४१ ।।