महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसौतिरुवाच
इत्येवं पुत्रशोकार्तं धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् । आश्वास्य स्वस्थमकरोत् सूतो गावलगणिस्तदा ॥ २५२ ॥ अत्रोपनिषदं पुण्यां कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । विद्वद्भिः कथ्यते लोके पुराणे कविसत्तमैः ॥ २५३ ॥ उग्रश्रवाजी कहते हैं—सूतवंशी संजयने यह सब कहकर पुत्रशोकसे व्याकुल नरपति धृतराष्ट्रको समझाया-बुझाया और उन्हें स्वस्थ किया। इसी इतिहासके आधारपर श्रीकृष्णद्वैपायनने इस परम पुण्यमयी उपनिषद्-रूप महाभारतका (शोकातुर प्राणियोंका शोक नाश करनेके लिये) निरूपण किया। विद्वज्जन लोकमें और श्रेष्ठतम कवि पुराणोंमें सदासे इसीका वर्णन करते आये हैं ॥ २५२-२५३ ॥
भारताध्ययनं पुण्यमपि पादमधीयतः । श्रद्दधानस्य पूयन्ते सर्वपापान्याशेषतः ॥ २५४ ॥ महाभारतका अध्ययन अन्तःकरणको शुद्ध करनेवाला है। जो कोई श्रद्धाके साथ इसके किसी एक श्लोकके एक पादका भी अध्ययन करता है, उसके सब पाप सम्पूर्णरूपसे मिट जाते हैं ॥ २५४ ॥
देवा देवर्षयो ह्यत्र तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः । कीर्त्यन्ते शुभकर्माणस्तथा यक्षा महोरगाः ॥ २५५ ॥ इस ग्रन्थरत्नमें शुभ कर्म करनेवाले देवता, देवर्षि, निर्मल ब्रह्मर्षि, यक्ष और महानागोंका वर्णन किया गया है ॥ २५५ ॥
भगवान् वासुदेवश्च कीर्त्यतेऽत्र सनातनः । स हि सत्यमृतं चैव पवित्रं पुण्यमेव च ॥ २५६ ॥ इस ग्रन्थके मुख्य विषय हैं स्वयं सनातन परब्रह्मस्वरूप वासुदेव भगवान् श्रीकृष्ण। उन्हींका इसमें संकीर्तन किया गया है। वे ही सत्य, ऋत, पवित्र एवं पुण्य हैं ॥ २५६ ॥
शाश्वतं ब्रह्म परमं ध्रुवं ज्योतिः सनातनम् । यस्य दिव्यानि कर्माणि कथयन्ति मनीषिणः ॥ २५७ ॥ वे ही शाश्वत परब्रह्म हैं और वे ही अविनाशी सनातन ज्योति हैं। मनीषी पुरुष उन्हींकी दिव्य लीलाओंका संकीर्तन किया करते हैं ॥ २५७ ॥
असच्च सदसच्चैव यस्माद् विश्वं प्रवर्तते । संततिश्च प्रवृत्तिश्च जन्ममृत्युपुनर्भवाः ॥ २५८ ॥ उन्हींसे असत्, सत् तथा सदसत्—उभयरूप सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता है। उन्हींसे संतति (प्रजा), प्रवृत्ति (कर्त्तव्य-कर्म), जन्म-मृत्यु तथा पुनर्जन्म होते