महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअद्यैव गर्भं कौसल्या विशिष्टं प्रतिपद्यताम् ।। ४७ ।। यदि कौसल्या (अम्बिका) मेरे गन्ध, रूप, वेष और शरीरको सहन कर ले तो वह आज ही एक उत्तम बालकको अपने गर्भमें पा सकती है ।। ४७ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा महातेजा व्यासः सत्यवतीं तदा । शयने सा च कौसल्या शुचिवस्त्रा ह्यलंकृता ।। ४८ ।। समागमनमाकाङ्क्षेदिति सोऽन्तर्हितो मुनिः । ततोऽभिगम्य सा देवी स्नुषां रहसि संगताम् ।। ४९ ।। धर्म्यमर्थसमायुक्तमुवाच वचनं हितम् । कौसल्ये धर्मतन्त्रं त्वां यद् ब्रवीमि निबोध तत् ।। ५० ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहनेके बाद महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ व्यासजी सत्यवतीसे फिर 'अच्छा तो कौसल्या (ऋतु-स्नानके पश्चात्) शुद्ध वस्त्र और शृंगार धारण करके शय्यापर मिलनकी प्रतीक्षा करे' यों कहकर अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर देवी सत्यवतीने एकान्तमें आयी हुई अपनी पुत्रवधू अम्बिकाके पास जाकर उससे (आपद्) धर्म और अर्थसे युक्त हितकारक वचन कहा—'कौसल्ये! मैं तुमसे जो धर्मसंगत बात कह रही हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो ।। ४८—५० ।।
भरतानां समुच्छेदो व्यक्तं मद्भाग्यसंक्षयात् । व्यथितां मां च सम्प्रेक्ष्य पितृवंशं च पीडितम् ।। ५१ ।। भीष्मो बुद्धिमदान्मह्यं कुलस्यास्य विवृद्धये । सा च बुद्धिस्त्वय्यधीना पुत्रि प्रापय मां तथा ।। ५२ ।। 'मेरे भाग्यका नाश हो जानेसे अब भरतवंशका उच्छेद हो चला है, यह स्पष्ट दिखायी दे रहा है। इसके कारण मुझे व्यथित और पितृकुलको पीड़ित देख भीष्मने इस कुलकी वृद्धिके लिये मुझे एक सम्मति दी है। बेटी! उस सम्मतिकी सार्थकता तुम्हारे अधीन है। तुम भीष्मके बताये अनुसार मुझे उस अवस्थामें पहुँचाओ, जिससे मैं अपने अभीष्टकी सिद्धि देख सकूँ ।। ५१-५२ ।।
नष्टं च भारतं वंशं पुनरेव समुद्धर । पुत्रं जनय सुश्रोणि देवराजसमप्रभम् ।। ५३ ।। स हि राज्यधुरं गुर्वीमुद्वक्ष्यति कुलस्य नः । 'सुश्रोणि! इस नष्ट होते हुए भरतवंशका पुनः उद्धार करो। तुम देवराज इन्द्रके समान एक तेजस्वी पुत्रको जन्म दो। वही हमारे कुलके इस महान् राज्यभारको वहन करेगा' ।। ५३ १/२ ।।