भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 785

ततो निष्क्रान्तमागम्य माता पुत्रमुवाच ह ।
अप्यस्या गुणवान् पुत्र राजपुत्रो भविष्यति ॥ ७ ॥
जब व्यासजी उसके महलसे बाहर निकले, तब माता सत्यवतीने आकर उनसे पूछा—‘बेटा! क्या अम्बिकाके गर्भसे कोई गुणवान् राजकुमार उत्पन्न होगा?’ ॥ ७ ॥
निशम्य तद् वचो मातुर्व्यासः सत्यवतीसुतः ।
नागायुतसमप्राणो विद्वान् राजर्षिसत्तमः ॥ ८ ॥
महाभागो महावीर्यो महाबुद्धिर्भविष्यति ।
तस्य चापि शतं पुत्रा भविष्यन्ति महात्मनः ॥ ९ ॥
माताका यह वचन सुनकर सत्यवतीनन्दन व्यासजी बोले—‘माँ! वह दस हजार हाथियोंके समान बलवान्, विद्वान्, राजर्षियोंमें श्रेष्ठ, परम सौभाग्यशाली, महापराक्रमी तथा अत्यन्त बुद्धिमान् होगा। उस महामनाके भी सौ पुत्र होंगे ॥ ८-९ ॥
किं तु मातुः स वैगुण्यादन्ध एव भविष्यति ।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा माता पुत्रमथाब्रवीत् ॥ १० ॥
नान्धः कुरूणां नृपतिरनुरूपस्तपोधन ।
ज्ञातिवंशस्य गोप्तारं पितॄणां वंशवर्धनम् ॥ ११ ॥
द्वितीयं कुरुवंशस्य राजानं दातुमर्हसि ।
‘किंतु माताके दोषसे वह बालक अन्धा ही होगा।’ व्यासजीकी यह बात सुनकर माताने कहा—‘तपोधन! कुरुवंशका राजा अन्धा हो यह उचित नहीं है। अतः कुरुवंशके लिये दूसरा राजा दो, जो जातिभाइयों तथा समस्त कुलका संरक्षक और पिताका वंश बढ़ानेवाला हो’ ॥ १०-११ १/२ ॥
स तथेति प्रतिज्ञाय निष्क्रक्राम महायशाः ॥ १२ ॥
महायशस्वी व्यासजी ‘तथास्तु’ कहकर वहाँसे निकल गये ॥ १२ ॥
सापि कालेन कौसल्या सुषुवेऽन्धं तमात्मजम् ।
पुनरेव तु सा देवी परिभाष्य स्नुषां ततः ॥ १३ ॥
ऋषिमावाहयत् सत्या यथा पूर्वमरिंदम ।
ततस्तेनैव विधिना महर्षिस्तामपद्यत ॥ १४ ॥
अम्बालिकामथाभ्यागादृषिं दृष्ट्वा च सापि तम् ।
विवर्णा पाण्डुसंकाशा समपद्यत भारत ॥ १५ ॥
प्रसवका समय आनेपर कौसल्याने उसी अन्धे पुत्रको जन्म दिया। जनमेजय! तत्पश्चात् देवी सत्यवतीने अपनी दूसरी पुत्रवधूको समझा-बुझाकर गर्भाधानके लिये तैयार किया और इसके लिये पूर्ववत् महर्षि व्यासका आवाहन किया। फिर महर्षिने उसी (नियोगकी संयमपूर्ण) विधिसे देवी अम्बालिकाके साथ समागम किया। भारत! महर्षि व्यासको देखकर वह भी कान्तिहीन तथा पाण्डुवर्णकी-सी हो गयी ॥ १३—१५ ॥