महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजोवाच
यन्मयापकृतं मोहादज्ञानादृषिसत्तम । प्रसादये त्वां तत्राहं न मे त्वं क्रोद्धुमर्हसि ॥ ४ ॥ **राजाने कहा—**मुनिवर! मैंने मोह अथवा अज्ञानवश जो अपराध किया है, उसके लिये आप मुझपर क्रोध न करें। मैं आपसे प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्ततो राज्ञा प्रसादमकरोन्मुनिः । कृतप्रसादं राजा तं ततः समवतारयत् ॥ ५ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजाके यों कहनेपर मुनि उनपर प्रसन्न हो गये। राजाने उन्हें प्रसन्न जानकर शूलीसे उतार दिया ॥ ५ ॥ अवतार्य च शूलाग्रात् तच्छूलं निष्ककर्ष ह । अशक्नुवंश्च निष्क्रष्टुं शूलं मूले स चिच्छिदे ॥ ६ ॥ नीचे उतारकर उन्होंने शूलके अग्रभागके सहारे उनके शरीरके भीतरसे शूलको निकालनेके लिये खींचा। खींचकर निकालनेमें असफल होनेपर उन्होंने उस शूलको मूलभागमें काट दिया ॥ ६ ॥ स तथान्तर्गतेनैव शूलेन व्यचरन्मुनिः । तेनातितपसा लोकान् विजिग्ये दुर्लभान् परैः ॥ ७ ॥ तबसे वे मुनि शूलाग्रभागको अपने शरीरके भीतर लिये हुए ही विचरने लगे। उस अत्यन्त घोर तपस्याके द्वारा महर्षिने ऐसे पुण्यलोकोंपर विजय पायी, जो दूसरोंके लिये दुर्लभ हैं ॥ ७ ॥ अणीमाण्डव्य इति च ततो लोकेषु गीयते । स गत्वा सदनं विप्रो धर्मस्य परमात्मवित् ॥ ८ ॥ आसनस्थं ततो धर्मं दृष्ट्वोपालभत प्रभुः । किं नु तद् दुष्कृतं कर्म मया कृतमजानता ॥ ९ ॥ यस्येयं फलनिर्वृत्तिरीदृश्यासादिता मया । शीघ्रमाचक्ष्व मे तत्त्वं पश्य मे तपसो बलम् ॥ १० ॥ अणी कहते हैं शूलके अग्रभागको, उससे युक्त होनेके कारण वे मुनि तभीसे सभी लोकोंमें 'अणी-माण्डव्य' कहलाने लगे। एक समय परमात्मतत्त्वके ज्ञाता विप्रवर माण्डव्यने धर्मराजके भवनमें जाकर उन्हें दिव्य आसनपर बैठे देखा। उस समय उन शक्तिशाली महर्षिने उन्हें उलाहना देते हुए पूछा—'मैंने अनजानमें कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिसके फलका भोग मुझे इस रूपमें प्राप्त हुआ? मुझे शीघ्र इसका रहस्य बताओ। फिर मेरी तपस्याका बल देखो' ॥ ८—१० ॥