महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअणीमाण्डव्य उवाच
बालो हि द्वादशाद् वर्षाज्जन्मतो यत् करिष्यति ।
न भविष्यत्यधर्मोऽत्र न प्रज्ञास्यन्ति वै दिशः ॥ १४ ॥
अणीमाण्डव्यने कहा— धर्मशास्त्रके अनुसार जन्मसे लेकर बारह वर्षकी आयुतक बालक जो कुछ भी करेगा, उसमें अधर्म नहीं होगा; क्योंकि उस समयतक बालकको धर्मशास्त्रके आदेशका ज्ञान नहीं हो सकेगा ॥ १४ ॥
अल्पेऽपराधेऽपि महान् मम दण्डस्त्वया कृतः ।
गरीयान् ब्राह्मणवधः सर्वभूतवधादपि ॥ १५ ॥
धर्मराज! तुमने थोड़े-से अपराधके लिये मुझे बहुत बड़ा दण्ड दिया है। ब्राह्मणका वध सम्पूर्ण प्राणियोंके वधसे भी अधिक भयंकर है ॥ १५ ॥
शूद्रयोनावतो धर्म मानुषः सम्भविष्यसि ।
मर्यादां स्थापयाम्यद्य लोके धर्मफलोदयाम् ॥ १६ ॥
अतः धर्म! तुम मनुष्य होकर शूद्रयोनिमें जन्म लोगे। आजसे संसारमें मैं धर्मके फलको प्रकट करनेवाली मर्यादा स्थापित करता हूँ ॥ १६ ॥
आ चतुर्दशकाद् वर्षान्न भविष्यति पातकम् ।
परतः कुर्वतामेवं दोष एव भविष्यति ॥ १७ ॥
चौदह वर्षकी उम्रतक किसीको पाप नहीं लगेगा। उससे अधिककी आयुमें पाप करनेवालोंको ही दोष लगेगा ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतेन त्वपराधेन शापात् तस्य महात्मनः ।
धर्मो विदुररूपेण शूद्रयोनावजायत ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! इसी अपराधके कारण महात्मा माण्डव्यके शापसे साक्षात् धर्म ही विदुररूपसे शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुए ॥ १८ ॥
धर्मे चार्थे च कुशलो लोभक्रोधविवर्जितः ।
दीर्घदर्शी शमपरः कुरूणां च हिते रतः ॥ १९ ॥
वे धर्मशास्त्र एवं अर्थशास्त्रके पण्डित, लोभ और क्रोधसे रहित, दीर्घदर्शी, शान्तिपरायण तथा कौरवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अणीमाण्डव्योपाख्याने
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अणीमाण्डव्योपाख्यानविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥