भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 809, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 809

धारण किये हुए उत्पन्न होगा। उसका वह कवच किन्हीं अस्त्र-शस्त्रोंसे टूट न सकेगा। उसके

पास कोई भी वस्तु ब्राह्मणोंके लिये अदेय न होगी। मेरे कहनेपर भी वह कभी अयोग्य कार्य

या विचारको अपने मनमें स्थान न देगा। ब्राह्मणोंके याचना करनेपर वह उन्हें सब प्रकारकी

वस्तुएँ देगा ही। साथ ही वह बड़ा स्वाभिमानी होगा।

मत्प्रसादान्न ते राज्ञि भविता दोष इत्युत ।

एवमुक्त्वा स भगवान् कुन्तिराजसुतां तदा ।। १७ ।।

प्रकाशकर्ता तपनः सम्बभूव तया सह ।

तत्र वीरः समभवत् सर्वशस्त्रभृतां वरः ।

आमुक्तकवचः श्रीमान् देवगर्भः श्रियान्वितः ।। १८ ।।

‘रानी! मेरी कृपासे तुम्हें दोष भी नहीं लगेगा।’ कुन्तिराजकुमारी कुन्तीसे यों कहकर

प्रकाश और गरमी उत्पन्न करनेवाले भगवान् सूर्यने उसके साथ समागम किया। इससे उसी

समय एक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था। उसने जन्मसे ही कवच

पहन रखा था और वह देवकुमारके समान तेजस्वी तथा शोभासम्पन्न था ।। १७-१८ ।।

सहजं कवचं बिभ्रत् कुण्डलो द्योतिताननः ।

अजायत सुतः कर्णः सर्वलोकेषु विश्रुतः ।। १९ ।।

जन्मके साथ ही कवच धारण किये उस बालकका मुख जन्मजात कुण्डलोंसे

प्रकाशित हो रहा था। इस प्रकार कर्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सब लोकोंमें विख्यात

है ।। १९ ।।

प्रादाच्च तस्यै कन्यात्वं पुनः स परमद्युतिः ।

दत्त्वा च तपतां श्रेष्ठो दिवमाचक्रमे ततः ।। २० ।।

उत्तम प्रकाशवाले भगवान् सूर्यने कुन्तीको पुनः कन्यात्व प्रदान किया। तत्पश्चात्

तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्य देवलोकमें चले गये ।। २० ।।

दृष्ट्वा कुमारं जातं सा वार्ष्णेयी दीनमानसा ।

एकाग्रं चिन्तयामास किं कृत्वा सुकृतं भवेत् ।। २१ ।।

उस नवजात कुमारको देखकर वृष्णिवंशकी कन्या कुन्तीके हृदयमें बड़ा दुःख हुआ।

उसने एकाग्रचितसे विचार किया कि अब क्या करनेसे अच्छा परिणाम निकलेगा ।। २१ ।।

गूहमानापचारं सा बन्धुपक्षभयात् तदा ।

उत्ससर्ज कुमारं तं जले कुन्ती महाबलम् ।। २२ ।।

उस समय कुटुम्बीजनोंके भयसे अपने उस अनुचित कृत्यको छिपाती हुई कुन्तीने

महाबली कुमार कर्णको जलमें छोड़ दिया ।। २२ ।।

तमुत्सृष्टं जले गर्भं राधाभर्ता महायशाः ।

पुत्रत्वे कल्पयामास सभार्यः सूतनन्दनः ।। २३ ।।s

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व · पृष्ठ 809, कुल 2256 में से · BharatKosha