महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमणि-मोती और मूँगे भी दिये ।। १४-१५ ।। तत् प्रगृह्य धनं सर्वं शल्यः सम्प्रीतमानसः । ददौ तां समलंकृत्य स्वसारं कौरवर्षभे ।। १६ ।। वह सारा धन लेकर शल्यका चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने अपनी बहिनको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके राजा पाण्डुके लिये कुरुश्रेष्ठ भीष्मजीको सौंप दिया ।। १६ ।। स तां माद्रीमुपादाय भीष्मः सागरगासुतः । आजगाम पुरीं धीमान् प्रविष्टो गजसाह्वयम् ।। १७ ।। परम बुद्धिमान् गंगानन्दन भीष्म माद्रीको लेकर हस्तिनापुरमें आये ।। १७ ।। तत इष्टेऽहनि प्राप्ते मुहूर्ते साधुसम्मते । जग्राह विधिवत् पाणिं माद्र्याः पाण्डुर्नराधिपः ।। १८ ।। तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके द्वारा अनुमोदित शुभ दिन और सुन्दर मुहूर्त आनेपर राजा पाण्डुने माद्रीका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया ।। १८ ।। ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा कुरुनन्दनः । स्थापयामास तां भार्या शुभे वेश्मनि भाविनीम् ।। १९ ।। इस प्रकार विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर कुरुनन्दन राजा पाण्डुने अपनी कल्याणमयी भार्याको सुन्दर महलमें ठहराया ।। १९ ।। स ताभ्यां व्यचरत् सार्धं भार्याभ्यां राजसत्तमः । कुन्त्या माद्र्या च राजेन्द्रो यथाकामं यथासुखम् ।। २० ।। राजाओंमें श्रेष्ठ महाराज पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों कुन्ती और माद्रीके साथ आनन्दपूर्वक यथेष्ट विहार करने लगे ।। २० ।। ततः स कौरवो राजा विहृत्य त्रिदशा निशाः । जिगीषया महीं पाण्डुर्निर्क्रामत् पुरात् प्रभो ।। २१ ।। जनमेजय! कुरुवंशी राजा पाण्डु तीस रात्रियोंतक विहार करके समूची पृथ्वीपर विजय प्राप्त करनेकी इच्छा लेकर राजधानीसे बाहर निकले ।। २१ ।। स भीष्मप्रमुखान् वृद्धानभिवाद्य प्रणम्य च । धृतराष्ट्रं च कौरव्यं तथान्यान् कुरुसत्तमान् । आमन्त्र्य प्रययौ राजा तैश्चैवाप्यनुमोदितः ।। २२ ।। मङ्गलाचारयुक्ताभिराशीर्भिरभिनन्दितः । गजवाजिरथौघेन बलेन महतागमत् ।। २३ ।। उन्होंने भीष्म आदि बड़े-बूढ़ोंके चरणोंमें मस्तक झुकाया। कुशनन्दन धृतराष्ट्र तथा अन्य श्रेष्ठ कुशवंशियोंको प्रणाम करके उन सबकी आज्ञा ली और उनका अनुमोदन