भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 828

संवत्सरद्वयं तं तु गान्धारी गर्भमाहितम् ॥ ९ ॥ अप्रजा धारयामास ततस्तां दुःखमाविशत् । श्रुत्वा कुन्तीसुतं जातं बालार्कसमतेजसम् ॥ १० ॥ तदनन्तर समयानुसार गान्धारीने धृतराष्ट्रसे गर्भ धारण किया। दो वर्ष व्यतीत हो गये, तबतक गान्धारी उस गर्भको धारण किये रही। फिर भी प्रसव नहीं हुआ। इसी बीचमें गान्धारीने जब यह सुना कि कुन्तीके गर्भसे प्रातःकालीन सूर्यके समान तेजस्वी पुत्रका जन्म हुआ है, तब उसे बड़ा दुःख हुआ ॥ ९-१० ॥

उदरस्यात्मनः स्थैर्यमुपलभ्यान्वचिन्तयत् । अज्ञातं धृतराष्ट्रस्य यत्नेन महता ततः ॥ ११ ॥ सोदरं घातयामास गान्धारी दुःखमूर्च्छिता । ततो जज्ञे मांसपेशी लोहाष्ठीलेव संहता ॥ १२ ॥ उसे अपने उदरकी स्थिरतापर बड़ी चिन्ता हुई। गान्धारी दुःखसे मूर्च्छित हो रही थी। उसने धृतराष्ट्रकी अनजानमें ही महान् प्रयत्न करके अपने उदरपर आघात किया। तब उसके गर्भसे एक मांसका पिण्ड प्रकट हुआ, जो लोहेके पिण्डके समान कड़ा था ॥ ११-१२ ॥

द्विवर्षसम्भृता कुक्षौ ताममुत्स्रष्टुं प्रचक्रमे । अथ द्वैपायनो ज्ञात्वा त्वरितः समुपागमत् ॥ १३ ॥ उसने दो वर्षोंतक उसे पेटमें धारण किया था, तो भी उसने उसे इतना कड़ा देखकर फेंक देनेका विचार किया। इधर यह बात महर्षि व्यासको मालूम हुई। तब वे बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आये ॥ १३ ॥

तां स मांसमयीं पेशीं ददर्श जपतां वरः । ततोऽब्रवीत् सौबलेयीं किमिदं ते चिकीर्षितम् ॥ १४ ॥ जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ व्यासजीने उस मांसपिण्डको देखा और गान्धारीसे पूछा—'तुम इसका क्या करना चाहती थीं?' ॥ १४ ॥

सा चात्मनो मतं सत्यं शशंस परमर्षये । और उसने महर्षिको अपने मनकी बात सच-सच बता दी।

गान्धार्युवाच

ज्येष्ठं कुन्तीसुतं जातं श्रुत्वा रविसमप्रभम् ॥ १५ ॥ दुःखेन परमेणेदमुदरं घातितं मया । शतं च किल पुत्राणां वितीर्णं मे त्वया पुरा ॥ १६ ॥ इयं च मे मांसपेशी जाता पुत्रशताय वै ।