महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 830, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंशशंस चैव भगवान् कालेनैतावता पुनः । उद्घाटनीयान्येतानि कुण्डानीति च सौबलीम् ॥ २३ ॥ तब भगवान् व्यासने गान्धारीसे कहा—'इतने ही दिन अर्थात् पूरे दो वर्षोंतक प्रतीक्षा करनेके बाद इन कुण्डोंका ढक्कन खोल देना चाहिये' ॥ २३ ॥
इत्युक्त्वा भगवान् व्यासस्तथा प्रतिविधाय च । जगाम तपसे धीमान् हिमवन्तं शिलोच्चयम् ॥ २४ ॥ यों कहकर और पूर्वोक्त प्रकारसे रक्षाकी व्यवस्था कराकर परम बुद्धिमान् भगवान् व्यास हिमालय पर्वतपर तपस्याके लिये चले गये ॥ २४ ॥
जज्ञे क्रमेण चैतेन तेषां दुर्योधनो नृपः । जन्मतस्तु प्रमाणेन ज्येष्ठो राजा युधिष्ठिरः ॥ २५ ॥ तदनन्तर दो वर्ष बीतनेपर जिस क्रमसे वे गर्भ उन कुण्डोंमें स्थापित किये गये थे, उसी क्रमसे उनमें सबसे पहले राजा दुर्योधन उत्पन्न हुआ। जन्मकालके प्रमाणसे राजा युधिष्ठिर उससे भी ज्येष्ठ थे ॥ २५ ॥
तदाख्यातं तु भीष्माय विदुराय च धीमते । यस्मिन्नहनि दुर्धर्षो जज्ञे दुर्योधनस्तदा ॥ २६ ॥ तस्मिन्नेव महाबाहुर्जज्ञे भीमोऽपि वीर्यवान् । स जातमात्र एवाथ धृतराष्ट्रसुतो नृप ॥ २७ ॥ रासभारावसदृशं रुराव च ननाद च । तं खराः प्रत्यभाषन्त गृध्रगोमायुवायसाः ॥ २८ ॥ दुर्योधनके जन्मका समाचार परम बुद्धिमान् भीष्म तथा विदुरजीको बताया गया। जिस दिन दुर्धर्ष वीर दुर्योधनका जन्म हुआ, उसी दिन परम पराक्रमी महाबाहु भीमसेन भी उत्पन्न हुए। राजन्! धृतराष्ट्रका वह पुत्र जन्म लेते ही गदहेके रेंकनेकी-सी आवाजमें रोने-चिल्लाने लगा। उसकी आवाज सुनकर बदलेमें दूसरे गदहे भी रेंकने लगे। गीध, गीदड़ और कौए भी कोलाहल करने लगे ॥ २६–२८ ॥
वाताश्च प्रववुश्चापि दिग्दाहश्चाभवत् तदा । ततस्तु भीतवद् राजा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ॥ २९ ॥ समानीय बहून् विप्रान् भीष्मं विदुरमेव च । अन्यांश्च सुहृदो राजन् कुरून् सर्वांस्तथैव च ॥ ३० ॥ बड़े जोरकी आँधी चलने लगी। सम्पूर्ण दिशाओंमें दाह-सा होने लगा। राजन्! तब राजा धृतराष्ट्र भयभीत-से हो उठे और बहुत-से ब्राह्मणोंको, भीष्मजी और विदुरजीको, दूसरे-दूसरे सुहृदों तथा समस्त कुरुवंशियोंको अपने समीप बुलवाकर उनसे इस प्रकार बोले— ॥ २९-३० ॥
युधिष्ठिरो राजपुत्रो ज्येष्ठो नः कुलवर्धनः ।