महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसे देखते ही राजा पाण्डुने पाँच सुन्दर एवं सुनहरे पंखोंसे युक्त तीखे तथा शीघ्रगामी बाणोंद्वारा, उस मृगी और मृगको भी बींध डाला ।। ६ ।।
स च राजन् महातेजा ऋषिपुत्रस्तपोधनः । भार्यया सह तेजस्वी मृगरूपेण संगतः ।। ७ ।।
राजन्! उस मृगके रूपमें एक महातेजस्वी तपोधन ऋषिपुत्र थे, जो अपनी मृगीरूपधारिणी पत्नीके साथ तेजस्वी मृग बनकर समागम कर रहे थे ।। ७ ।।
संसक्तश्च तया मृग्या मानुषीमीरयन् गिरम् । क्षणेन पतितो भूमौ विललापाकुलेन्द्रियः ।। ८ ।।
वे उस मृगीसे सटे हुए ही मनुष्योंकी-सी बोली बोलते हुए क्षणभरमें पृथ्वीपर गिर पड़े। उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं और वे विलाप करने लगे ।। ८ ।।
मृग उवाच
काममन्युपरीता हि बुद्ध्या विरहिता अपि । वर्जयन्ति नृशंसानि पापेष्वपि रता नराः ।। ९ ।। न विधिं ग्रसते प्रज्ञा प्रज्ञां तु ग्रसते विधिः । विधिपर्यागतानर्थान् प्राज्ञो न प्रतिपद्यते ।। १० ।।