महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे पिता अपनी अनेक संतानोंमें सर्वदा समभाव रखता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंके प्रति मेरा सदा समानभाव होगा। (पहले कहे अनुसार) मैं केवल एक समय वृक्षोंसे भिक्षा माँगूँगा अथवा यह सम्भव न हुआ तो दस-पाँच घरोंमें घूमकर (थोड़ी-थोड़ी) भिक्षा ले लूँगा ।। १२ ।।
असम्भवे वा भैक्ष्यस्य चरन्नशनान्यपि । अल्पमल्पं च भुञ्जानः पूर्वालाभे न जातुचित् ।। १३ ।। अन्यान्यपि चरँल्लोभादलाभे सप्त पूरयन् । अलाभे यदि वा लाभे समदर्शी महातपाः ।। १४ ।।
अथवा यदि भिक्षा मिलनी असम्भव हो जाय, तो कई दिनतक उपवास ही करता चलूँगा। (भिक्षा मिल जानेपर भी) भोजन थोड़ा-थोड़ा ही करूँगा। ऊपर बताये हुए एक प्रकारसे भिक्षा न मिलनेपर ही दूसरे प्रकारका आश्रय लूँगा। ऐसा तो कभी न होगा कि लोभवश दूसरे-दूसरे बहुत-से घरोंमें जाकर भिक्षा लूँ। यदि कहीं कुछ न मिला तो भिक्षाकी पूर्तिके लिये सात घरोंपर फेरी लगा लूँगा। यदि मिला तो और न मिला तो, दोनों ही दशाओंमें समान दृष्टि रखते हुए भारी तपस्यामें लगा रहूँगा ।। १३-१४ ।।
वास्यैकं तक्षतो बाहुं चन्दनेनैकमुक्षतः । नाकल्याणं न कल्याणं चिन्तयन्नुभयोस्तयोः ।। १५ ।। न जिजीविषुवत् किंचिन्न मुमूर्षुवदाचरन् । जीवितं मरणं चैव नाभिनन्दन् न च द्विषन् ।। १६ ।।
एक आदमी बसूलेसे मेरी एक बाँह काटता हो और दूसरा मेरी दूसरी बाँहपर चन्दन छिड़कता हो तो उन दोनोंमेंसे एकके अकल्याणका और दूसरेके कल्याणका चिन्तन नहीं करूँगा। जीने अथवा मरनेकी इच्छावाले मनुष्य जैसी चेष्टाएँ करते हैं, वैसी कोई चेष्टा मैं नहीं करूँगा। न जीवनका अभिनन्दन करूँगा, न मृत्युसे द्वेष ।। १५-१६ ।।
याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः । ताः सर्वाः समतिक्रम्य निमेषादिव्यवस्थिताः ।। १७ ।। तासु चाप्यनवस्थासु त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः । सम्परित्यक्तधर्मार्थः सुनिर्णीक्तात्मकल्मषः ।। १८ ।।
जीवित पुरुषोंद्वारा अपने अभ्युदयके लिये जो-जो कर्म किये जा सकते हैं, उन समस्त सकाम कर्मोंको मैं त्याग दूँगा; क्योंकि वे सब कालसे सीमित हैं। अनित्य फल देनेवाली क्रियाओंके लिये जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा चेष्टा की जाती है, उस चेष्टाको भी मैं सर्वथा त्याग दूँगा; धर्मके फलको भी छोड़ दूँगा। अपने अन्तःकरणके मलको सर्वथा धोकर शुद्ध हो जाऊँगा ।। १७-१८ ।।
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो व्यतीतः सर्ववागुराः । न वशे कस्यचित् तिष्ठन् सधर्मा मातरिश्वनः ।। १९ ।।