भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 849

निशम्य वचनं भर्तुर्वानवासे धृतात्मनः । तत्समं वचनं कुन्ती माद्री च समभाषताम् ॥ २६ ॥ वनवासके लिये दृढ़ निश्चय करनेवाले पतिदेवका यह वचन सुनकर कुन्ती और माद्रीने उनके योग्य बात कही— ॥ २६ ॥

अन्येऽपि ह्याश्रमाः सन्ति ये शक्या भरतर्षभ । आवाभ्यां धर्मपत्नीभ्यां सह तप्तुं तपो महत् ॥ २७ ॥ ‘भरतश्रेष्ठ! संन्यासके सिवा और भी तो आश्रम हैं, जिनमें आप हम धर्मपत्नियोंके साथ रहकर भारी तपस्या कर सकते हैं ॥ २७ ॥ शरीरस्यापि मोक्षाय स्वर्ग्यं प्राप्य महाफलम् । त्वमेव भविता भर्ता स्वर्गस्यापि न संशयः ॥ २८ ॥ ‘आपकी वह तपस्या स्वर्गदायक महान् फलकी प्राप्ति कराकर इस शरीरसे भी मुक्ति दिलानेमें समर्थ हो सकती है। इसमें संदेह नहीं कि उस तपके प्रभावसे आप ही स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र भी हो सकते हैं ॥ २८ ॥ प्रणिधायेन्द्रियग्रामं भर्तृलोकपरायणे । त्यक्तकामसुखे ह्यावां तप्स्यावो विपुलं तपः ॥ २९ ॥