भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 876

पतता तेन शतधा शिला गात्रैर्विचूर्णिता । तां शिलां चूर्णितां दृष्ट्वा पाण्डुर्विस्मयमागतः ॥ १८ ॥ गिरते समय उसने अपने अंगोंसे उस पर्वतकी शिलाको चूर्ण-विचूर्ण कर दिया। पत्थरकी चट्टानको चूर-चूर हुआ देख महाराज पाण्डु बड़े आश्चर्यमें पड़ गये ॥ १८ ॥ (मघे चन्द्रमसा युक्ते सिंहे चाभ्युदिते गुरौ । दिवामध्यगते सूर्ये तिथौ पुण्ये त्रयोदशे ॥ मैत्रे मुहूर्ते सा कुन्ती सुषुवे भीममच्युतम् ॥) यस्मिन्नहनि भीमस्तु जज्ञे भरतसत्तम । दुर्योधनोऽपि तत्रैव प्रजज्ञे वसुधाधिप ॥ १९ ॥ जब चन्द्रमा मघा नक्षत्रपर विराजमान थे, बृहस्पति सिंह लग्नमें सुशोभित थे, सूर्यदेव दोपहरके समय आकाशके मध्यभागमें तप रहे थे, उस समय पुण्यमयी त्रयोदशी तिथिको मैत्र मुहूर्तमें कुन्तीदेवीने अविचल शक्तिवाले भीमसेनको जन्म दिया था। भरतश्रेष्ठ भूपाल! जिस दिन भीमसेनका जन्म हुआ था, उसी दिन हस्तिनापुरमें दुर्योधनकी भी उत्पत्ति हुई ॥ १९ ॥ जाते वृकोदरे पाण्डुरिदं भूयोऽन्वचिन्तयत् । कथं नु मे वरः पुत्रो लोकश्रेष्ठो भवेदिति ॥ २० ॥ भीमसेनके जन्म लेनेपर पाण्डुने फिर इस प्रकार विचार किया कि मैं कौन-सा उपाय करूँ, जिससे मुझे सब लोगोंसे श्रेष्ठ उत्तम पुत्र प्राप्त हो ॥ २० ॥ दैवे पुरुषकारे च लोकोऽयं सम्प्रतिष्ठितः । तत्र दैवं तु विधिना कालयुक्तेन लभ्यते ॥ २१ ॥ यह संसार दैव तथा पुरुषार्थपर अवलम्बित है। इनमें दैव तभी सुलभ (सफल) होता है, जब समयपर उद्योग किया जाय ॥ २१ ॥ इन्द्रो हि राजा देवानां प्रधान इति नः श्रुतम् । अप्रमेयबलोत्साहो वीर्यवानमितद्युतिः ॥ २२ ॥ तं तोषयित्वा तपसा पुत्रं लप्स्ये महाबलम् । यं दास्यति स मे पुत्रं स वरीयान् भविष्यति ॥ २३ ॥ अमानुषान् मानुषांश्च संग्रामे स हनिष्यति । कर्मणा मनसा वाचा तस्मात् तप्स्ये महत् तपः ॥ २४ ॥ मैंने सुना है कि देवराज इन्द्र ही सब देवताओंमें प्रधान हैं, उनमें अथाह बल और उत्साह है। वे बड़े पराक्रमी एवं अपार तेजस्वी हैं। मैं तपस्याद्वारा उन्हींको संतुष्ट करके महाबली पुत्र प्राप्त करूँगा। वे मुझे जो पुत्र देंगे, वह निश्चय ही सबसे श्रेष्ठ होगा तथा संग्राममें अपना सामना करनेवाले मनुष्यों तथा मनुष्येतर प्राणियों (दैत्य-दानव आदि)-को