महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी च परंतप ।। ६८ ।।
दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च विशाम्पते ।
स्थाणुर्भगश्च भगवान् रुद्रास्तत्रावतस्थिरे ।। ६९ ।।
शत्रुदमन महाराज! मृगव्याध और सर्प, महा-यशस्वी निर्ऋति एवं अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य और पिनाकी, दहन तथा ईश्वर, कपाली एवं स्थाणु तथा भगवान् भग—ये ग्यारह रुद्र भी वहाँ आकाशमें आकर खड़े थे ।। ६८-६९ ।।
अश्विनौ वसवश्चाष्टौ मरुतश्च महाबलाः ।
विश्वेदेवास्तथा साध्यास्तत्रासन् परितः स्थिताः ।। ७० ।।
दोनों अश्विनीकुमार तथा आठों वसु, महाबली मरुद्गण एवं विश्वेदेवगण तथा साध्यगण वहाँ सब ओर विद्यमान थे ।। ७० ।।
कर्कोटकोऽथ सर्पश्च वासुकिश्च भुजङ्गमः ।
कश्यपश्चाथ कुण्डश्च तक्षकश्च महोरगः ।। ७१ ।।
आययुस्तपसा युक्ता महाक्रोधा महाबलाः ।
एते चान्ये च बहवस्तत्र नागा व्यवस्थिताः ।। ७२ ।।
कर्कोटक सर्प तथा वासुकि नाग, कश्यप और कुण्ड, महानाग और तक्षक—ये तथा और भी बहुत-से महाबली, महाक्रोधी और तपस्वी नाग वहाँ आकर खड़े थे ।। ७१-७२ ।।
तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च गरुडश्चासितध्वजः ।
अरुणश्चारुणिश्चैव वैनतेया व्यवस्थिताः ।। ७३ ।।
तार्क्ष्य और अरिष्टनेमि, गरुड एवं असितध्वज, अरुण तथा आरुणि—विनताके ये पुत्र भी उस उत्सवमें उपस्थित थे ।। ७३ ।।
तांश्च देवगणान् सर्वांस्तपःसिद्धा महर्षयः ।
विमानगिर्यग्रगतान् ददृशुर्नेतरे जनाः ।। ७४ ।।
वे सब देवगण विमान और पर्वतके शिखरपर खड़े थे। उन्हें तपःसिद्ध महर्षि ही देख पाते थे, दूसरे लोग नहीं ।। ७४ ।।
तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता मुनिसत्तमाः ।
अधिकां स्म ततो वृत्तिमवर्तन् पाण्डवान् प्रति ।। ७५ ।।
वह महान् आश्चर्य देखकर वे श्रेष्ठ मुनिगण बड़े विस्मयमें पड़े। तबसे पाण्डवोंके प्रति उनमें अधिक प्रेम और आदरका भाव पैदा हो गया ।। ७५ ।।
पाण्डुस्तु पुनरैवैनां पुत्रलोभान्महायशाः ।
वक्तुमैच्छद् धर्मपत्नीं कुन्ती त्वेनमथाब्रवीत् ।। ७६ ।।
तदनन्तर महायशस्वी राजा पाण्डु पुत्र-लोभसे आकृष्ट हो अपनी धर्मपत्नी कुन्तीसे फिर कुछ कहना चाहते थे, किंतु कुन्ती उन्हें रोकती हुई बोली— ।। ७६ ।।
नातश्चतुर्थं प्रसवमापत्स्वपि वदन्त्युत ।