महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'सौत होनेके कारण मेरे मनमें एक अभिमान है, जो कुन्तीदेवीसे कुछ निवेदन करनेमें बाधक हो रहा है; अतः यदि आप मुझपर प्रसन्न हों तो आप स्वयं ही मेरे लिये कुन्तीदेवीको प्रेरित कीजिये' ।। ६ ।।
पाण्डुरुवाच
ममाप्येष सदा माद्रि हृद्यर्थः परिवर्तते । न तु त्वां प्रसहे वक्तुमिष्टानिष्टविवक्षया ।। ७ ।। पाण्डु बोले— माद्री! यह बात मेरे मनमें भी निरन्तर घूमती रहती है, किंतु इस विषयमें तुमसे कुछ कहनेका साहस नहीं होता था; क्योंकि पता नहीं, तुम यह प्रस्ताव सुनकर प्रसन्न होओगी या बुरा मान जाओगी। यह संदेह बराबर बना रहता था ।। ७ ।। तव त्विदं मतं मत्वा प्रपतिष्याम्यतः परम् । मन्ये ध्रुवं मयोक्ता सा वचनं प्रतिपत्स्यते ।। ८ ।। परंतु आज इस विषयमें तुम्हारी सम्मति जानकर अब मैं इसके लिये प्रयत्न करूँगा। मुझे विश्वास है, मेरे कहनेपर कुन्तीदेवी निश्चय ही मेरी बात मान लेंगी ।। ८ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततः कुन्तीं पुनः पाण्डुर्विविक्त इदमब्रवीत् । कुलस्य मम संतानं लोकस्य च कुरु प्रियम् ।। ९ ।। मम चापिण्डनाशाय पूर्वेषामपि चात्मनः । मत्प्रियार्थं च कल्याणि कुरु कल्याणमुत्तमम् ।। १० ।। वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब राजा पाण्डुने एकान्तमें कुन्तीसे यह बात कही—'कल्याणि! मेरी कुलपरम्पराका विच्छेद न हो और सम्पूर्ण जगत्का प्रिय हो, ऐसा कार्य करो। मेरे तथा अपने पूर्वजोंके लिये पिण्डका अभाव न हो और मेरा भी प्रिय हो, इसके लिये तुम परम उत्तम कल्याणमय कार्य करो ।। ९-१० ।। यशसोऽर्थाय चैव त्वं कुरु कर्म सुदुष्करम् । प्राप्याधिपत्यमिन्द्रेण यज्ञैरिष्टं यशोऽर्थिना ।। ११ ।। 'अपने यशका विस्तार करनेके लिये तुम अत्यन्त दुष्कर कर्म करो, जैसे इन्द्रने स्वर्गका साम्राज्य प्राप्त कर लेनेके बाद भी केवल यशकी कामनासे अनेकानेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ।। ११ ।। तथा मन्त्रविदो विप्रास्तपस्तप्त्वा सुदुष्करम् । गुरून्भ्युपगच्छन्ति यशसोऽर्थाय भाविनि ।। १२ ।। 'भामिनि! मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण अत्यन्त कठोर तपस्या करके भी यशके लिये गुरुजनोंकी शरण ग्रहण करते हैं ।। १२ ।। तथा राजर्षयः सर्वे ब्राह्मणाश्च तपोधनाः ।