महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 892, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुननेको मिलेगा।' एक दिन अपने भाई-बन्धुओंके साथ बैठकर सब वृष्णिवंशी जब इस प्रकार पाण्डुके विषयमें कुछ बातें कर रहे थे, उसी समय उन्होंने पाण्डुके पुत्र होनेका समाचार सुना। सुनते ही सब-के-सब हर्षविभोर हो उठे और परस्पर सद्भाव प्रकट करते हुए वसुदेवजीसे इस प्रकार बोले—
वृष्णय ऊचुः
न भवेरन् क्रियाहीनाः पाण्डोः पुत्रा महायशः।
पाण्डोः प्रियहितान्वेषी प्रेषय त्वं पुरोहितम्॥
वृष्णियोंने कहा— महायशस्वी वसुदेवजी! हम चाहते हैं कि राजा पाण्डुके पुत्र संस्कारहीन न हों; अतः आप पाण्डुके प्रिय और हितकी इच्छा रखकर उनके पास किसी पुरोहितको भेजिये।
वैशम्पायन उवाच
वसुदेवस्तथेत्युक्त्वा विससर्ज पुरोहितम्।
युक्तानि च कुमाराणां पारिबर्हाण्यनेकणः॥
कुन्तीं माद्रीं च संदिश्य दासीदासपरिच्छदम्।
गाश्व रौप्यं हिरण्यं च प्रेषयामास भारत॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब 'बहुत अच्छा' कहकर वसुदेवजीने पुरोहितको भेजा; साथ ही उन कुमारोंके लिये उपयोगी अनेक प्रकारकी वस्त्राभूषण-सामग्री भी भेजी। कुन्ती और माद्रीके लिये भी दासी, दास, वस्त्राभूषण आदि आवश्यक सामान, गौएँ, चाँदी और सुवर्ण भिजवाये।
तानि सर्वाणि संगृह्य प्रययौ स पुरोहितः।
तमागतं द्विजश्रेष्ठं काश्यपं वै पुरोहितम्॥
पूजयामास विधिवत् पाण्डुः परपुरञ्जयः।
पृथा माद्री च संहृष्टे वसुदेवं प्रशंसताम्॥
उन सब सामग्रियोंको एकत्र करके अपने साथ ले पुरोहितने वनको प्रस्थान किया। शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले राजा पाण्डुने पुरोहित द्विजश्रेष्ठ काश्यपके आनेपर उनका विधिपूर्वक पूजन किया। कुन्ती और माद्रीने प्रसन्न होकर वसुदेवजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।
ततः पाण्डुः क्रियाः सर्वाः पाण्डवानामकारयत्।
गर्भाधानादिकृत्यानि चौलोपनयनानि च॥
काश्यपः कृतवान् सर्वमुपाकर्म च भारत।
चौलोपनयनादूर्ध्वमृषभाक्षा यशस्विनः॥
वैदिकाध्ययने सर्वे समपद्यन्त पारगाः।