भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 905

दारकेष्वप्रमत्ता च भवेथाश्च हिता मम । अतोऽन्यन्न प्रपश्यामि संदेष्टव्यं हि किंचन ॥ ३० ॥ 'मेरे पुत्रोंका हित चाहती हुई सावधान रहकर उनका पालन-पोषण करें। इसके सिवा दूसरी कोई बात मुझे आपसे कहनेयोग्य नहीं जान पड़ती' ॥ ३० ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा तं चिताग्निस्थं धर्मपत्नी नरर्षभम् । मद्रराजसुता तूर्णमन्वारोहद् यशस्विनी ॥ ३१ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! कुन्तीसे यह कहकर पाण्डुकी यशस्विनी धर्मपत्नी माद्री चिताकी आगपर रखे हुए नरश्रेष्ठ पाण्डुके शवके साथ स्वयं भी चितापर जा बैठी ॥ ३१ ॥

(ततः पुरोहितः स्नात्वा प्रेतकर्मणि पारगः । हिरण्यशकलान्याज्यं तिलान् दधि च तण्डुलान् ॥ उदकुम्भं सपरशुं समानीय तपस्विभिः । अश्वमेधाग्निमाहृत्य यथान्यायं समन्ततः ॥ काश्यपः कारयामास पाण्डोः प्रेतस्य तां क्रियाम् ॥ तदनन्तर प्रेतकर्मके पारंगत विद्वान् पुरोहित काश्यपने स्नान करके सुवर्णखण्ड, घृत, तिल, दही, चावल, जलसे भरा घड़ा और फरसा आदि वस्तुओंको एकत्र करके तपस्वी मुनियोंद्वारा अश्वमेधकी अग्नि मँगवायी और उसे चारों ओरसे चितासे छुलाकर यथायोग्य शास्त्रीय विधिसे पाण्डुका दाह-संस्कार करवाया।

अहताम्बरसंवीतो भ्रातृभिः सहितोऽनघः । उदकं कृतवांस्तत्र पुरोहितमते स्थितः ॥ अर्हतस्तस्य कृत्यानि शतशृङ्गनिवासिनः । तापसा विधिवच्चक्रुश्चारणा ऋषिभिः सह ॥) भाइयोंसहित निष्पाप युधिष्ठिरने नूतन वस्त्र धारण करके पुरोहितकी आज्ञाके अनुसार जलांजलि देनेका कार्य पूरा किया। शतशृंगनिवासी तपस्वी मुनियों और चारणोंने आदरणीय राजा पाण्डुके परलोक-सम्बन्धी सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न किये।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डूपरमे चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुके परलोकगमनविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५० १/२ श्लोक मिलाकर कुल ८१ १/२ श्लोक हैं)

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