महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
ऋषियोंका कुन्ती और पाण्डवोंको लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथों सौंपना
वैशम्पायन उवाच
पाण्डोरुपरमं दृष्ट्वा देवकल्पा महर्षयः।
ततो मन्त्रविदः सर्वे मन्त्रयांचक्रिरे मिथः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा पाण्डुकी मृत्यु हुई देख वहाँ रहनेवाले, देवताओंके समान तेजस्वी सम्पूर्ण मन्त्रज्ञ महर्षियोंने आपसमें सलाह की ॥ १ ॥
तापसा ऊचुः
हित्वा राज्यं च राष्ट्रं च स महात्मा महायशाः।
अस्मिन् स्थाने तपस्तप्त्वा तापसाञ्छरणं गतः ॥ २ ॥
**तपस्वी बोले—**महान् यशस्वी महात्मा राजा पाण्डु अपना राज्य तथा राष्ट्र छोड़कर इस स्थानपर तपस्या करते हुए तपस्वी मुनियोंकी शरणमें रहते थे ॥ २ ॥
स जातमात्रान् पुत्रांश्च दारांश्च भवतामिह।
प्रदायोपनिधिं राजा पाण्डुः स्वर्गमितो गतः ॥ ३ ॥
वे राजा पाण्डु अपनी पत्नी और नवजात पुत्रोंको आपलोगोंके पास धरोहर रखकर यहाँसे स्वर्गलोक चले गये ॥ ३ ॥
तस्येमानात्मजान् देहं भार्यां च सुमहात्मनः।
स्वराष्ट्रं गृह्य गच्छामो धर्म एष हि नः स्मृतः ॥ ४ ॥
उनके इन पुत्रोंको, पाण्डु और माद्रीके शरीरोंकी अस्थियोंको तथा उन महात्मा नरेशकी महारानी कुन्तीको लेकर हमलोग उनकी राजधानीमें चलें। इस समय हमारे लिये यही धर्म प्रतीत होता है ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
ते परस्परमामन्त्र्य देवकल्पा महर्षयः।
पाण्डोः पुत्रान् पुरस्कृत्य नगरं नागसाह्वयम् ॥ ५ ॥
उदारमनसः सिद्धा गमने चक्रिरे मनः।
भीष्माय पाण्डवान् दातुं धृतराष्ट्राय चैव हि ॥ ६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार परस्पर सलाह करके उन देवतुल्य उदारचेता सिद्ध महर्षियोंने पाण्डवोंको भीष्म एवं धृतराष्ट्रके हाथों सौंप देनेके लिये पाण्डुपुत्रोंको आगे करके हस्तिनापुर नगरमें जानेका विचार किया ॥ ५-६ ॥