भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 909

तथा भीष्मः शान्तनवः सोमदत्तोऽथ बाह्लिकः । प्रज्ञाचक्षुश्च राजर्षिः क्षत्ता च विदुरः स्वयम् ॥ १५ ॥ इसी प्रकार शन्तनुन्दन भीष्म, सोमदत्त, बाह्लिक, प्रज्ञाचक्षु राजर्षि धृतराष्ट्र, संजय तथा स्वयं विदुरजी भी वहाँ आ गये ॥ १५ ॥ सा च सत्यवती देवी कौसल्या च यशस्विनी । राजदारैः परिवृता गान्धारी चापि निर्ययौ ॥ १६ ॥ देवी सत्यवती, काशिराजकुमारी यशस्विनी कौसल्या तथा राजघरानेकी स्त्रियोंसे घिरी हुई गान्धारी भी अन्तःपुरसे निकलकर वहाँ आयीं ॥ १६ ॥ धृतराष्ट्रस्य दायादा दुर्योधनपुरोगमाः । भूषिता भूषणैश्चित्रैः शतसंख्या विनिर्ययुः ॥ १७ ॥ धृतराष्ट्रके दुर्योधन आदि सौ पुत्र विचित्र आभूषणोंसे विभूषित हो नगरसे बाहर निकले ॥ १७ ॥ तान् महर्षिगणान् दृष्ट्वा शिरोभिरभिवाद्य च । उपोपविविशुः सर्वे कौरव्याः सपुरोहिताः ॥ १८ ॥ उन महर्षियोंका दर्शन करके सबने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। फिर सभी कौरव पुरोहितके साथ उनके समीप बैठ गये ॥ १८ ॥ तथैव शिरसा भूमावभिवाद्य प्रणम्य च । उपोपविविशुः सर्वे पौरा जानपदा अपि ॥ १९ ॥ इसी प्रकार नगर तथा जनपदके सब लोग भी धरतीपर माथा टेककर सबको अभिवादन और प्रणाम करके आसपास बैठ गये ॥ १९ ॥ तमकूजमभिज्ञाय जनौघं सर्वशस्तदा । पूजयित्वा यथान्यायं पाद्येनार्घ्येण च प्रभो ॥ २० ॥ भीष्मो राज्यं च राष्ट्रं च महर्षिभ्यो न्यवेदयत् । तेषामथो वृद्धतमः प्रत्युत्थाय जटाजिनी । ऋषीणां मतमाज्ञाय महर्षिरिदमब्रवीत् ॥ २१ ॥ राजन्! उस समय वहाँ आये हुए समस्त जनसमुदायको चुपचाप बैठे देख भीष्मजीने पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा सब महर्षियोंकी यथोचित पूजा करके उन्हें अपने राज्य तथा राष्ट्रका कुशल-समाचार निवेदन किया। तब उन महर्षियोंमें जो सबसे अधिक वृद्ध थे, वे जटा और मृगचर्म धारण करनेवाले मुनि अन्य सब ऋषियोंकी अनुमति लेकर इस प्रकार बोले— ॥ २०-२१ ॥ यः स कौरव्य दायादः पाण्डुर्नाम नराधिपः । कामभोगान् परित्यज्य शतशृङ्गमतो गतः ॥ २२ ॥ (स यथोक्तं तपस्तेपे तत्र मूलफलाशनः ॥