महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 914, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिबिकां तामलंकृत्य वाससाऽऽच्छाद्य सर्वशः ॥ ७ ॥ इसके बाद वसन्त-ऋतुमें सुलभ नाना प्रकारके सुन्दर पुष्पों तथा श्रेष्ठ गन्धोंसे एक शिबिका (वैकुण्ठी)-को सजाकर उसे सब ओरसे वस्त्रद्वारा ढँक दिया गया ॥ ७ ॥
तां तथा शोभितां माल्यैर्वासोभिश्च महाधनैः । अमात्या ज्ञातयश्चैनं सुहृदश्चोपतस्थिरे ॥ ८ ॥ इस प्रकार बहुमूल्य वस्त्रों और पुष्पमालाओंसे सुशोभित उस शिबिकाके समीप मन्त्री, भाई-बन्धु और सुहृद्-सम्बन्धी—सब लोग उपस्थित हुए ॥ ८ ॥
नृसिंहं नरयुक्तेन परमालंकृतेन तम् । अवहन् यानमुख्येन सह माद्र्या सुसंयतम् ॥ ९ ॥ उसमें माद्रीके साथ पाण्डुकी अस्थियाँ भली-भाँति बाँधकर रखी गयी थीं। मनुष्योंद्वारा ढोई जानेवाली और अच्छी तरह सजायी हुई उस शिबिकाके द्वारा वे सभी बन्धु-बान्धव माद्रीसहित नरश्रेष्ठ पाण्डुकी अस्थियोंको ढोने लगे ॥ ९ ॥
पाण्डुरेणातपत्रेण चामरव्यजनेन च । सर्ववादित्रनादैश्च समलंचक्रिरे ततः ॥ १० ॥ शिबिकाके ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ था। चँवर डुलाये जा रहे थे। सब प्रकारके बाजों-गाजोंसे उसकी शोभा और भी बढ़ गयी थी ॥ १० ॥
रत्नानि चाप्युपादाय बहूनि शतशो नराः । प्रददुः काङ्क्षमाणेभ्यः पाण्डोस्तस्यौर्ध्वदेहिके ॥ ११ ॥ सैकड़ों मनुष्योंने उन महाराज पाण्डुके दाह-संस्कारके दिन बहुत-से रत्न लेकर याचकोंको दिये ॥ ११ ॥
अथच्छत्राणि शुभ्राणि चामराणि बृहन्ति च । आजह्रुः कौरवस्यार्थे वासांसि रुचिराणि च ॥ १२ ॥ इसके बाद कुरुराज पाण्डुके लिये अनेक श्वेत छत्र, बहुतेरे बड़े-बड़े चँवर तथा कितने ही सुन्दर-सुन्दर वस्त्र लोग वहाँ ले आये ॥ १२ ॥
याजकैः शुक्लवासोभिर्हूयमाना हुताशनाः । अगच्छन्नग्रतस्तस्य दीप्यमानाः स्वलंकृताः ॥ १३ ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव सहस्रशः । रुदन्तः शोकसंतप्ता अनुजग्मुर्नराधिपम् ॥ १४ ॥ पुरोहितलोग सफेद वस्त्र धारण करके अग्निहोत्रकी अग्निमें आहुति डालते जाते थे। वे अग्नियाँ माला आदिसे अलंकृत एवं प्रज्वलित हो पाण्डुकी पालकीके आगे-आगे चल रही थीं। सहस्रों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र शोकसे संतप्त हो रोते हुए महाराज पाण्डुकी शिबिकाके पीछे जा रहे थे ॥ १३-१४ ॥
अयमस्मानपाहाय दुःखे चाधाय शाश्वते ।