महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब नागोंने भीमसेनके लिये स्वस्तिवाचन किया। फिर वे पाण्डुकुमार पवित्र हो पूर्वाभिमुख बैठकर कुण्डका रस पीने लगे ।। ७० ।।
एकोच्छ्वासात् ततः कुण्डं पिबति स्म महाबलः ।
एवमष्टौ स कुण्डानि ह्यपिबत् पाण्डुनन्दनः ।। ७१ ।।
वे एक ही साँसमें एक कुण्डका रस पी जाते थे। इस प्रकार उन महाबली पाण्डुनन्दनने आठ कुण्डोंका रस पी लिया ।। ७१ ।।
ततस्तु शयने दिव्ये नागदत्ते महाभुजः ।
अशेत भीमसेनस्तु यथासुखमरिंदमः ।। ७२ ।।
इसके बाद शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबाहु भीमसेन नागोंकी दी हुई दिव्य शय्यापर सुखपूर्वक सो गये ।। ७२ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीमसेनरसपाने
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीमसेनके रसपानसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२७ ।।
१. दाँतोंसे काट-काटकर खाये जानेवाले मालपूए आदिको भक्ष्य कहते हैं। २. दाँतका सहारा न लेकर केवल जिह्वाके व्यापारसे जिसे भोजन किया जाता है, जैसे हलुआ, खीर आदि। ३. पीनेयोग्य दुग्ध आदि। ४. चूसनेयोग्य वस्तु जिसका रसमात्र ग्रहण किया जाय और बाकी चीजको त्याग दिया जाय, वह चोष्य है, जैसे ईख-आम आदि। ५. लेह्य—चाटनेयोग्य चटनी आदि।