भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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इसके आगे जम्बूखण्ड विनिर्माणपर्व है। तदनन्तर भूमिपर्व कहा गया है, जिसमें द्वीपोंके विस्तारका कीर्तन किया गया है ।। ६७ ।। पर्वोक्तं भगवद्गीता पर्व भीष्मवधस्ततः । द्रोणाभिषेचनं पर्व संशप्तकवधस्ततः ।। ६८ ।। इसके बाद क्रमशः भगवद्गीता, भीष्मवध, द्रोणाभिषेक तथा संशप्तकवधपर्व हैं ।। ६८ ।। अभिमन्युवधः पर्व प्रतिज्ञापर्व चोच्यते । जयद्रथवधः पर्व घटोत्कचवधस्ततः ।। ६९ ।। इसके बाद अभिमन्युवधपर्व, प्रतिज्ञापर्व, जयद्रथवधपर्व और घटोत्कचवधपर्व हैं ।। ६९ ।। ततो द्रोणवधः पर्व विज्ञेयं लोमहर्षणम् । मोक्षो नारायणास्त्रस्य पर्वानन्तरमुच्यते ।। ७० ।। फिर रोंगटे खड़े कर देनेवाला द्रोणवधपर्व जानना चाहिये। तदनन्तर नारायणास्त्रमोक्षपर्व कहा गया है ।। ७० ।। कर्णपर्व ततो ज्ञेयं शल्यपर्व ततः परम् । ह्रदप्रवेशनं पर्व गदायुद्धमतः परम् ।। ७१ ।। फिर कर्णपर्व और उसके बाद शल्यपर्व है। इसी पर्वमें ह्रदप्रवेश और गदायुद्धपर्व भी हैं ।। ७१ ।। सारस्वतं ततः पर्व तीर्थवंशानुकीर्तनम् । अत ऊर्ध्वं सुबीभत्सं पर्व सौप्तिकमुच्यते ।। ७२ ।। तदनन्तर सारस्वतपर्व है, जिसमें तीर्थों और वंशोंका वर्णन किया गया है। इसके बाद है अत्यन्त बीभत्स सौप्तिकपर्व ।। ७२ ।। ऐषीकं पर्व चोद्दिष्टमत ऊर्ध्वं सुदारुणम् । जलप्रदानिकं पर्व स्त्रीविलापस्ततः परम् ।। ७३ ।। इसके बाद अत्यन्त दारुण ऐषीकपर्वकी कथा है। फिर जलप्रदानिक और स्त्रीविलापपर्व आते हैं ।। ७३ ।। श्राद्धपर्व ततो ज्ञेयं कुरूणामौर्ध्वदेहिकम् । चार्वाकनिग्रहः पर्व रक्षसो ब्रह्मरूपिणः ।। ७४ ।। तत्पश्चात् श्राद्धपर्व है, जिसमें मृत कौरवोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका वर्णन है। उसके बाद ब्राह्मण-वेषधारी राक्षस चार्वाकके निग्रहका पर्व है ।। ७४ ।। आभिषेचनिकं पर्व धर्मराजस्य धीमतः । प्रविभागो गृहाणां च पर्वोक्तं तदनन्तरम् ।। ७५ ।।

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