महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 931, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें'वह सदा दुर्योधनकी आँखोंमें खटकता रहता है। दुर्योधन क्रूर, दुर्बुद्धि, क्षुद्र, राज्यका लोभी तथा निर्लज्ज है ॥ १५ ॥ निहन्यादपि तं वीरं जातमन्युः सुयोधनः । तेन मे व्याकुलं चित्तं हृदयं दह्यतीव च ॥ १६ ॥ 'अतः सम्भव है, वह क्रोधमें वीर भीमसेनको धोखा देकर मार भी डाले। इसी चिन्तासे मेरा चित्त व्याकुल हो उठा है, हृदय दग्ध-सा हो रहा है' ॥ १६ ॥
विदुर उवाच
मैवं वदस्व कल्याणि शेषसंरक्षणं कुरु । प्रत्यादिष्टो हि दुष्टात्मा शेषेऽपि प्रहरेत् तव ॥ १७ ॥ विदुरजीने कहा— कल्याणी! ऐसी बात मुँहसे न निकालो, शेष पुत्रोंकी रक्षा करो। यदि दुर्योधनको उलाहना देकर इस विषयमें पूछ-ताछ की जायगी तो वह दुष्टात्मा तुम्हारे शेष पुत्रोंपर भी प्रहार कर सकता है ॥ १७ ॥ दीर्घायुषस्तव सुता यथोवाच महामुनिः । आगमिष्यति ते पुत्रः प्रीतिं चोत्पादयिष्यति ॥ १८ ॥ महामुनि व्यासने पहले जैसा कहा है, उसके अनुसार तुम्हारे ये सभी पुत्र दीर्घजीवी हैं, अतः तुम्हारा पुत्र भीमसेन कहीं भी क्यों न गया हो, अवश्य लौटेगा और तुम्हें आनन्द प्रदान करेगा ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा ययौ विद्वान् विदुरः स्वं निवेशनम् । कुन्ती चिन्तापरा भूत्वा सहासीना सुतैर्गृहे ॥ १९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! विद्वान् विदुर यों कहकर अपने घरमें चले गये। इधर कुन्ती चिन्तामग्न होकर अपने चारों पुत्रोंके साथ चुपचाप घरमें बैठ रही ॥ १९ ॥ ततोऽष्टमे तु दिवसे प्रत्यबुध्यत पाण्डवः । तस्मिंस्तदा रसे जीर्णे सोऽप्रमेयबलो बली ॥ २० ॥ उधर, नागलोकमें सोये हुए बलवान् भीमसेन आठवें दिन, जब वह रस पच गया, जगे। उस समय उनके बलकी कोई सीमा नहीं रही ॥ २० ॥ तं दृष्ट्वा प्रतिबुध्यन्तं पाण्डवं ते भुजङ्गमाः । सान्त्वयामासुरव्यग्रा वचनं चेदमब्रुवन् ॥ २१ ॥ पाण्डुनन्दन भीमको जगा हुआ देख सब नागोंने शान्त-चित्तसे उन्हें आश्वासन दिया और यह बात कही— ॥ २१ ॥ यत् ते पीतो महाबाहो रसोऽयं वीर्यसम्भृतः । तस्मान्नागायुतबलो रणेऽधृष्यो भविष्यसि ॥ २२ ॥