भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 946

सौहृदान्यपि जीर्यन्ते कालेन परिजीर्यतः । सौहृदं मे त्वया ह्यासीत् पूर्वं सामर्थ्यबन्धनम् ॥ ६ ॥ समयके अनुसार मनुष्य ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों-ही-त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है। पहले तुम्हारे साथ जो मेरी मित्रता थी, वह सामर्थ्यको लेकर थी—उस समय मैं और तुम दोनों समान शक्तिशाली थे ॥ ६ ॥

न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित् । कालो ह्येनं विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत ॥ ७ ॥ लोकमें किसी भी मनुष्यके हृदयमें मैत्री अमिट होकर नहीं रहती। समय एक मित्रको दूसरेसे विलग कर देता है अथवा क्रोध मनुष्यको मित्रतासे हटा देता है ॥ ७ ॥

मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवत्वपाकृधि । आसीत् सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम् ॥ ८ ॥ इस प्रकार क्षीण होनेवाली मैत्रीका भरोसा न करो। हम दोनों एक-दूसरेके मित्र थे—इस भावको हृदयसे निकाल दो। द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि स्वार्थको लेकर हुई थी ॥ ८ ॥

न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान् विदुषः सखा । न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमिष्यते ॥ ९ ॥ सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्‌का, मूर्ख विद्वान्‌का और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो ॥ ९ ॥

ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम् । तयोर्विवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥ १० ॥ जिनका धन समान है, जिनकी विद्या एक-सी है, उन्हींमें विवाह और मैत्रीका सम्बन्ध हो सकता है। हृष्ट-पुष्ट और दुर्बलमें (धनवान् और निर्धनमें) कभी मित्रता नहीं हो सकती ॥ १० ॥

नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते ॥ ११ ॥ जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय (वेदवेत्ता)-का मित्र नहीं हो सकता। जो रथी नहीं है, वह रथीका सखा नहीं हो सकता। इसी प्रकार जो राजा नहीं है, वह किसी राजाका मित्र कदापि नहीं हो सकता। फिर तुम पुरानी मित्रताका क्यों स्मरण करते हो? ॥ ११ ॥

वैशम्पायन उवाच

द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाजः प्रतापवान् । मुहूर्तं चिन्तयित्वा तु मन्युनाभिपरिप्लुतः ॥ १२ ॥ स विनिश्चित्य मनसा पाञ्चालं प्रति बुद्धिमान् ।