महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तदा भीष्मो भारद्वाजमभाषत ॥ ७६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**द्रोणाचार्यके यों कहनेपर भीष्मने उनसे कहा ॥ ७६ ॥
भीष्म उवाच
अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय । भुङ्क्ष्व भोगान् भृशं प्रीतः पूज्यमानः कुरुक्षये ॥ ७७ ॥ **भीष्मजी बोले—**विप्रवर! अब आप अपने धनुषकी डोरी उतार दीजिये और यहाँ रहकर राजकुमारोंको धनुर्वेद एवं अस्त्र-शस्त्रोंकी अच्छी शिक्षा दीजिये। कौरवोंके घरमें सदा सम्मानित रहकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ मनोवांछित भोगोंका उपभोग कीजिये ॥ ७७ ॥
कुरूणामस्ति यद् वित्तं राज्यं चेदं सराष्ट्रकम् । त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव ॥ ७८ ॥ कौरवोंके पास जो धन, राज्य-वैभव तथा राष्ट्र है, उसके आप ही सबसे बड़े राजा हैं। समस्त कौरव आपके अधीन हैं ॥ ७८ ॥
यच्च ते प्रार्थितं ब्रह्मन् कृतं तदिति चिन्त्यताम् । दिष्ट्या प्राप्तोऽसि विप्रर्षे महान् मेऽनुग्रहः कृतः ॥ ७९ ॥ ब्रह्मन्! आपने जो माँग की है, उसे पूर्ण हुई समझिये। ब्रह्मर्षे! आप आये, यह हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। आपने यहाँ पधारकर मुझपर महान् अनुग्रह किया है ॥ ७९ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मद्रोणसमागमे त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्म-द्रोण-समागमविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३० ॥
* जौके आकारकी बनी हुई काठकी मोटी गुल्लीको ‘बीटा’ कहते हैं।