महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलाघवं शब्दवेधित्वं दृष्ट्वा तत् परमं तदा । प्रेक्ष्य तं व्रीडिताश्चासन् प्रशशंसुश्च सर्वशः ॥ ४२ ॥ वह हाथकी फुर्ती और शब्दके अनुसार लक्ष्य बेधनेकी उत्तम शक्ति देखकर उस समय सब राजकुमार उस कुत्तेकी ओर दृष्टि डालकर लज्जित हो गये और सब प्रकारसे बाण मारनेवालेकी प्रशंसा करने लगे ॥ ४२ ॥ तं ततोऽन्वेषमाणास्ते वने वननिवासिनम् । ददृशुः पाण्डवा राजन्नस्यन्तमनिशं शरान् ॥ ४३ ॥ राजन्! तत्पश्चात् पाण्डवोंने उस वनवासी वीरकी वनमें खोज करते हुए उसे निरन्तर बाण चलाते हुए देखा ॥ ४३ ॥ न चैनमभ्यजानंस्ते तदा विकृतदर्शनम् । अथैनं परिपप्रच्छुः को भवान् कस्य वेत्युत ॥ ४४ ॥ उस समय उसका रूप बदल गया था। पाण्डव उसे पहचान न सके; अतः पूछने लगे—‘तुम कौन हो, किसके पुत्र हो?’ ॥ ४४ ॥
एकलव्य उवाच
निषादाधिपतेर्वीरा हिरण्यधनुषः सुतम् ।