महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्रोणाचार्यका यह दारुण वचन सुनकर सदा सत्यपर अटल रहनेवाले एकलव्यने अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए पहलेकी ही भाँति प्रसन्नमुख और उदारचित्त रहकर बिना कुछ सोच-विचार किये अपना दाहिना अँगूठा काटकर द्रोणाचार्यको दे दिया ।। ५७-५८ ।।
(स सत्यसंधं नैषादिं दृष्ट्वा प्रीतोऽब्रवीदिदम् । एवं कर्तव्यमिति वा एकलव्यमभाषत ।।) ततः शरं तु नैषादिरङ्गुलीभिर्व्यकर्षत । न तथा च स शीघ्रोऽभूद् यथा पूर्वं नराधिप ।। ५९ ।। द्रोणाचार्य निषादनन्दन एकलव्यको सत्यप्रतिज्ञ देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने संकेतसे उसे यह बता दिया कि तर्जनी और मध्यमाके संयोगसे बाण पकड़कर किस प्रकार धनुषकी डोरी खींचनी चाहिये। तबसे वह निषादकुमार अपनी अँगुलीयोंद्वारा ही बाणोंका संधान करने लगा। राजन्! उस अवस्थामें वह उतनी शीघ्रतासे बाण नहीं चला पाता था, जैसे पहले चलाया करता था ।। ५९ ।। ततोऽर्जुनः प्रीतमना बभूव विगतज्वरः । द्रोणश्च सत्यवागासीन्नान्योऽभिभवितार्जुनम् ।। ६० ।।