भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

राजकुमारोंका रंगभूमिमें अस्त्र-कौशल दिखाना

वैशम्पायन उवाच

कृतास्त्रान् धार्तराष्ट्रांश्च पाण्डुपुत्रांश्च भारत ।
दृष्ट्वा द्रोणोऽब्रवीद् राजन् धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥ १ ॥
कृपस्य सोमदत्तस्य बाह्लीकस्य च धीमतः ।
गाङ्गेयस्य च सांनिध्ये व्यासस्य विदुरस्य च ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भारत! जब द्रोणने देखा कि धृतराष्ट्रके पुत्र तथा पाण्डव अस्त्र-विद्याकी शिक्षा समाप्त कर चुके, तब उन्होंने कृपाचार्य, सोमदत्त, बुद्धिमान् बाह्लीक, गंगानन्दन भीष्म, महर्षि व्यास तथा विदुरजीके निकट राजा धृतराष्ट्रसे कहा— ॥ १-२ ॥

राजन् सम्प्राप्तविद्यास्ते कुमाराः कुरुसत्तम ।
ते दर्शयेयुः स्वां शिक्षां राजन्ननुमते तव ॥ ३ ॥
ततोऽब्रवीन्महाराजः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
‘राजन्! आपके कुमार अस्त्र-विद्याकी शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। कुरुश्रेष्ठ! यदि आपकी अनुमति हो तो वे अपनी सीखी हुई अस्त्र-संचालनकी कलाका प्रदर्शन करें’।
यह सुनकर महाराज धृतराष्ट्र अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे बोले ॥ ३ १/२ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

भारद्वाज महत् कर्म कृतं ते द्विजसत्तम ॥ ४ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**द्विजश्रेष्ठ भरद्वाजनन्दन! आपने (राजकुमारोंको अस्त्रकी शिक्षा देकर) बहुत बड़ा कार्य किया है ॥ ४ ॥

यदानुमन्यसे कालं यस्मिन् देशे यथा यथा ।
तथा तथा विधानाय स्वयमाज्ञापयस्व माम् ॥ ५ ॥
आप कुमारोंकी अस्त्र-शिक्षाके प्रदर्शनके लिये जब जो समय ठीक समझें, जिस स्थानपर जिस-जिस प्रकारका प्रबन्ध आवश्यक मानें, उस-उस तरहकी तैयारी करनेके लिये स्वयं ही मुझे आज्ञा दें ॥ ५ ॥

स्पृहयाम्यद्य निर्वेदात् पुरुषाणां सचक्षुषाम् ।
अस्त्रहेतोः पराक्रान्तान् ये मे द्रक्ष्यन्ति पुत्रकान् ॥ ६ ॥
आज मैं नेत्रहीन होनेके कारण दुःखी होकर, जिनके पास आँखें हैं, उन मनुष्योंके सुख और सौभाग्यको पानेके लिये तरस रहा हूँ; क्योंकि वे अस्त्र-कौशलका प्रदर्शन करनेके लिये भाँति-भाँतिके पराक्रम करनेवाले मेरे पुत्रोंको देखेंगे ॥ ६ ॥