महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 991, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें**कर्णने कहा—**अर्जुन! यह रंगमण्डप तो सबके लिये साधारण है, इसमें तुम्हारा क्या लगा है? जो बल और पराक्रममें श्रेष्ठ होते हैं, वे ही राजा कहलानेयोग्य हैं। धर्म भी बलका ही अनुसरण करता है ॥ १९ ॥ किं क्षेपैर्दुर्बलायासैः शरैः कथय भारत । गुरोः समक्षं यावत् ते हराम्यद्य शिरः शरैः ॥ २० ॥ भारत! आक्षेप करना तो दुर्बलोंका प्रयास है। इससे क्या लाभ है? साहस हो तो बाणोंसे बातचीत करो। मैं आज तुम्हारे गुरुके सामने ही बाणोंद्वारा तुम्हारा सिर धड़से अलग किये देता हूँ ॥ २० ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः पार्थः परपुरंजयः । भ्रातृभिस्त्वरयाऽऽश्लिष्टो रणायोपजगाम तम् ॥ २१ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर शत्रुओंके नगरको जीतनेवाले कुन्तीनन्दन अर्जुन आचार्य द्रोणकी आज्ञा ले तुरंत अपने भाइयोंसे गले मिलकर युद्धके लिये कर्णकी ओर बढ़े ॥ २१ ॥ ततो दुर्योधनेनापि सभ्रात्रा समरोद्यतः । परिष्वक्तः स्थितः कर्णः प्रगृह्य सशरं धनुः ॥ २२ ॥ तब भाइयोंसहित दुर्योधनने भी धनुष-बाण ले युद्धके लिये तैयार खड़े हुए कर्णका आलिंगन किया ॥ २२ ॥ ततः सविद्युत्स्तनितैः सेन्द्रायुधपुरोगमैः । आवृतं गगनं मेघैर्बलाकापङ्क्तिहासिभिः ॥ २३ ॥ उस समय बकपंक्तियोंके व्याजसे हास्यकी छटा बिखेरनेवाले बादलोंने बिजलीकी चमक, गड़गड़ाहट और इन्द्रधनुषके साथ समूचे आकाशको ढक लिया ॥ २३ ॥ ततः स्नेहाद्धरिर्हयं दृष्ट्वा रङ्गावलोकिनम् । भास्करोऽप्यनयन्नाशं समीपोपगतान् घनान् ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् अर्जुनके प्रति स्नेह होनेके कारण इन्द्रको रंगभूमिका अवलोकन करते देख भगवान् सूर्यने भी अपने समीपके बादलोंको छिन्न-भिन्न कर दिया ॥ २४ ॥ मेघच्छायोपगूढस्तु ततोऽदृश्यत फाल्गुनः । सूर्यातपपरिक्षिप्तः कर्णोऽपि समदृश्यत ॥ २५ ॥ तब अर्जुन मेघकी छायामें छिपे हुए दिखायी देने लगे और कर्ण भी सूर्यकी प्रभासे प्रकाशित दीखने लगा ॥ २५ ॥ धार्तराष्ट्रा यतः कर्णस्तस्मिन् देशे व्यवस्थिताः । भारद्वाजः कृपो भीष्मो यतः पार्थस्ततोऽभवन् ॥ २६ ॥