महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें**भीमसेनने कहा—**वानर! मेरे प्राण संकटमें पड़े या और कोई दुष्परिणाम भोगना पड़े, इसके विषयमें तुमसे कुछ नहीं पूछता हूँ। उठो और मुझे आगे जानेके लिये रास्ता दो। ऐसा होनेपर तुमको मेरे हाथोंसे किसी प्रकारका कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा ।। ६ ।।
हनूमानुवाच
नास्ति शक्तिर्ममोत्थातुं व्याधिना क्लेशितो ह्यहम् ।
यद्यवश्यं प्रयातव्यं लङ्घयित्वा प्रयाहि माम् ।। ७ ।।
**हनुमान्जी बोले—**भाई! मैं रोगसे कष्ट पा रहा हूँ। मुझमें उठनेकी शक्ति नहीं है। यदि तुम्हें जाना अवश्य है तो मुझे लाँघकर चले जाओ ।। ७ ।।
भीम उवाच
निर्गुणः परमात्मा तु देहं व्याप्यावतिष्ठते ।
तमहं ज्ञानविज्ञेयं नावमन्ये न लङ्घये ।। ८ ।।
**भीमसेनने कहा—**निर्गुण परमात्मा समस्त प्राणियोंके शरीरमें व्याप्त होकर स्थित हैं। वे ज्ञानसे ही जाननेमें आते हैं। मैं उनका अपमान या उल्लंघन नहीं करूँगा ।। ८ ।।
यद्यागमैर्न विद्यां च तमहं भूतभावनम् ।
क्रमेयं त्वां गिरिं चैव हनूमानिव सागरम् ।। ९ ।।
यदि शास्त्रोंके द्वारा मुझे उन भूतभावन भगवान्के स्वरूपका ज्ञान न होता तो मैं तुम्हींको क्या इस पर्वतको भी उसी प्रकार लाँघ जाता, जैसे हनुमान्जी समुद्रको लाँघ गये थे ।। ९ ।।
हनूमानुवाच
क एष हनुमान् नाम सागरो येन लङ्घितः ।
पृच्छामि त्वां नरश्रेष्ठ कथ्यतां यदि शक्यते ।। १० ।।
**हनुमान्जी बोले—**नरश्रेष्ठ! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, वह हनुमान् कौन था जो समुद्रको लाँघ गया था? उसके विषयमें यदि तुम कुछ कह सको तो कहो ।। १० ।।
भीम उवाच
भ्राता मम गुणश्लाघ्यो बुद्धिसत्त्वबलान्वितः ।
रामायणेऽतिविख्यातः श्रीमान् वानरपुङ्गवः ।। ११ ।।
**भीमसेनने कहा—**वानरप्रवर श्रीहनुमान्जी मेरे बड़े भाई हैं। वे अपने सद्गुणोंके कारण सबके लिये प्रशंसनीय हैं। वे बुद्धि, बल, धैर्य एवं उत्साहसे युक्त हैं। रामायणमें उनकी बड़ी ख्याति है ।। ११ ।।
रामपत्नीकृते येन शतयोजनविस्तृतः ।
सागरः प्लवगेन्द्रेण क्रमेणैकेन लङ्घितः ।। १२ ।।