महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1009, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंयत् ते मम परिज्ञाने कौतूहलमरिंदम । तत् सर्वमखिलेन त्वं शृणु पाण्डवनन्दन ॥ २६ ॥ हनुमान्जी बोले— शत्रुदमन पाण्डुनन्दन! तुम्हारे मनमें मेरा परिचय प्राप्त करनेके लिये जो कौतूहल हो रहा है उसकी शान्तिके लिये सब बातें विस्तारपूर्वक सुनो ॥ अहं केसरिणः क्षेत्रे वायुना जगदायुषा । जातः कमलपत्राक्ष हनूमान् नाम वानरः ॥ २७ ॥ कमलनयन भीम! मैं वानरश्रेष्ठ केसरीके क्षेत्रमें जगत्के प्राणस्वरूप वायुदेवसे उत्पन्न हुआ हूँ। मेरा नाम हनुमान् वानर है ॥ २७ ॥ सूर्यपुत्रं च सुग्रीवं शक्रपुत्रं च वालिनम् । सर्वे वानरराजानस्तथा वानरयूथपाः ॥ २८ ॥ उपतस्थुर्महावीर्या मम चामित्रकर्षण । सुग्रीवेणाभवत् प्रीतिरनिलस्याग्निना यथा ॥ २९ ॥ पूर्वकालमें सभी वानरराज और वानरयूथपति, जो महान् पराक्रमी थे, सूर्यनन्दन सुग्रीव तथा इन्द्रकुमार वालीकी सेवामें उपस्थित रहते थे। शत्रुसूदन भीम! उन दिनों सुग्रीवके साथ मेरी वैसी ही प्रेमपूर्ण मित्रता थी, जैसी वायुकी अग्निके साथ मानी गयी है ॥ २८-२९ ॥ निकृतः स ततो भ्रात्रा कस्मिंश्चित् कारणान्तरे । ऋष्यमूके मया सार्धं सुग्रीवो न्यवसच्चिरम् ॥ ३० ॥ किसी कारणान्तरसे वालीने अपने भाई सुग्रीवको घरसे निकाल दिया, तब बहुत दिनोंतक वे मेरे साथ ऋष्यमूक पर्वतपर रहे ॥ ३० ॥ अथ दाशरथिर्वीरो रामो नाम महाबलः । विष्णुर्मानुषरूपेण चचार वसुधात लम् ॥ ३१ ॥ उस समय महाबली वीर दशरथनन्दन श्रीराम, जो साक्षात् भगवान् विष्णु ही थे, मनुष्यरूप धारण करके इस भूतलपर विचर रहे थे ॥ ३१ ॥ स पितुः प्रियमन्विच्छन् सहभार्यः सहानुजः । सधनुर्धन्विनां श्रेष्ठो दण्डकारण्यमाश्रितः ॥ ३२ ॥ वे अपने पिताकी आज्ञा पालन करनेके लिये पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मणके साथ दण्डकारण्यमें चले आये। धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ रघुनाथजी सदा धनुष-बाण लिये रहते थे ॥ ३२ ॥ तस्य भार्या जनस्थानाच्छलेनापहृता बलात् । राक्षसेन्द्रेण बलिना रावणेन दुरात्मना ॥ ३३ ॥ सुवर्णरत्नचित्रेण मृगरूपेण रक्षसा । वञ्चयित्वा नरव्याघ्रं मारीचेन तदानघ ॥ ३४ ॥