महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबलवर्ष्मप्रभावा हि प्रहीयन्त्युद्भवन्ति च ।
तदलं बत तद् रूपं द्रष्टुं कुरुकुलोद्वह ।
युगं समनुवर्तामि कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ९ ॥
‘सत्ययुगका समय दूसरा था तथा त्रेता और द्वापरका दूसरा ही है। यह काल सभी वस्तुओंको नष्ट करनेवाला है। अब मेरा वह रूप है ही नहीं। पृथ्वी, नदी, वृक्ष, पर्वत, सिद्ध, देवता और महर्षि—ये सभी कालका अनुसरण करते हैं। प्रत्येक युगके अनुसार सभी वस्तुओंके शरीर, बल और प्रभावमें न्यूनाधिकता होती रहती है। अतः कुरुश्रेष्ठ! तुम उस स्वरूपको देखनेका आग्रह न करो। मैं भी युगका अनुसरण करता हूँ; क्योंकि कालका उल्लंघन करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है’ ॥ ७—९ ॥
भीम उवाच
युगसंख्यां समाचक्ष्व आचारं च युगे युगे ।
धर्मकामार्थभावांश्च कर्मवीर्ये भवाभवौ ॥ १० ॥
**भीमसेनने कहा—**कपिप्रवर! आप मुझे युगोंकी संख्या बताइये और प्रत्येक युगमें जो आचार, धर्म, अर्थ एवं कामके तत्त्व, शुभाशुभ कर्म, उन कर्मोंकी शक्ति तथा उत्पत्ति और विनाशादि भाव होते हैं, उनका भी वर्णन कीजिये ॥ १० ॥
हनूमानुवाच
कृतं नाम युगं तात यत्र धर्मः सनातनः ।
कृतमेव न कर्तव्यं तस्मिन् काले युगोत्तमे ॥ ११ ॥
**हनुमान्जी बोले—**तात! सबसे पहला कृतयुग है। उसमें सनातनधर्मकी पूर्ण स्थिति रहती है। उसका कृतयुग नाम इसलिये पड़ा है कि उस उत्तम युगके लोग अपना सब कर्तव्यकर्म सम्पन्न ही कर लेते थे। उनके लिये कुछ करना शेष नहीं रहता था (अतः ‘कृतम् एव सर्वं शुभं यस्मिन् युगे’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार वह ‘कृतयुग’ कहलाया) ॥ ११ ॥
न तत्र धर्माः सीदन्ति क्षीयन्ते न च वै प्रजाः ।
ततः कृतयुगं नाम कालेन गुणतां गतम् ॥ १२ ॥
उस समय धर्मका ह्रास नहीं होता था। प्रजाका अर्थात् (माता-पिताके रहते हुए) संतानका नाश नहीं होता था। तदनन्तर कालक्रमसे उसमें गौणता आ गयी ॥ १२ ॥
देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः ।
नासन् कृतयुगे तात तदा न क्रयविक्रयः ॥ १३ ॥
तात! कृतयुगमें देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग नहीं थे, अर्थात् ये परस्पर भेद-भाव नहीं रखते थे। उस समय क्रय-विक्रयका व्यवहार भी नहीं था ॥ १३ ॥
न सामऋग्यजुर्वर्णाः क्रिया नासीच्च मानवी ।
अभिध्याय फलं तत्र धर्मः संन्यास एव च ॥ १४ ॥