भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1021, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1021

दीर्घलाङ्गूलमाविध्य दिशो व्याप्य स्थितः कपिः । तद् रूपं महदालक्ष्य भ्रातुः कौरवनन्दनः ॥ ६ ॥ विसिष्मिये तदा भीमो जहृषे च पुनः पुनः । तमर्कमिव तेजोभिः सौवर्णमिव पर्वतम् ॥ ७ ॥ प्रदीप्तमिव चाकाशं दृष्ट्वा भीमो न्यमीलयत् । आबभाषे च हनुमान् भीमसेनं स्मयन्निव ॥ ८ ॥ वे वानरवीर अपनी विशाल पूँछको हिलाते हुए सम्पूर्ण दिशाओंको घेरकर खड़े थे। भाईके उस विराट् रूपको देखकर कौरवनन्दन भीमको बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके शरीरमें बार-बार हर्षसे रोमांच होने लगा। हनुमान्जी तेजमें सूर्यके समान दिखायी देते थे। उनका शरीर सुवर्णमय मेरुपर्वतके समान था और उनकी प्रभासे सारा आकाशमण्डल प्रज्वलित-सा जान पड़ता था। उनकी ओर देखकर भीमसेनने दोनों आँखें बंद कर लीं। तब हनुमान्जी उनसे मुसकराते हुए-से बोले— ॥ ६—८ ॥ एतावदिह शक्तस्त्वं द्रष्टुं रूपं ममानघ । वर्धेऽहं चाप्यतो भूयो यावन्मे मनसि स्थितम् । भीमशत्रुषु चात्यर्थं वर्धते मूर्तिरोजसा ॥ ९ ॥ ‘अनघ! तुम यहाँ मेरे इतने ही बड़े रूपको देख सकते हो, परंतु मैं इससे भी बड़ा हो सकता हूँ। मेरे मनमें जितने बड़े स्वरूपकी भावना होती है, उतना ही मैं बढ़ सकता हूँ।

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