महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1037, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह सरोवर दिव्य सौगन्धिक कमलोंसे आवृत तथा रमणीय था। परम सुगन्धित सुवर्णमय कमल उसे ढँके हुए थे। उन कमलोंकी नाल उत्तम वैदूर्यमणिमय थी। वे कमल देखनेमें अत्यन्त विचित्र और मनोरम थे। हंस और कारण्डव आदि पक्षी उन कमलोंको हिलाते रहते थे, जिससे वे निर्मल पराग प्रकट किया करते थे ॥ ६-७ ॥ आक्रीडं राजराजस्य कुबेरस्य महात्मनः । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च देवैश्च परमार्चितम् ॥ ८ ॥ वह सरोवर राजाधिराज महाबुद्धिमान् कुबेरका क्रीडास्थल था। गन्धर्व, अप्सरा और देवता भी उसकी बड़ी प्रशंसा करते थे ॥ ८ ॥ सेवितामृषिभिर्दिव्यैर्यक्षैः किम्पुरुषैस्तथा । राक्षसैः किन्नरैश्चापि गुप्तां वैश्रवणेन च ॥ ९ ॥ दिव्य ऋषि-मुनि, यक्ष, किम्पुरुष, राक्षस और किन्नर उसका सेवन करते थे तथा साक्षात् कुबेरके द्वारा उसके संरक्षणकी व्यवस्था की जाती थी ॥ ९ ॥ तां च दृष्ट्वैव कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः । बभूव परमप्रीतो दिव्यं सम्प्रेक्ष्य तत् सरः ॥ १० ॥ कुन्तीनन्दन महाबली भीमसेन उस दिव्य सरोवरको देखते ही अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १० ॥ तच्च क्रोधवशा नाम राक्षसा राजशासनात् । रक्षन्ति शतसाहस्राश्चित्रायुधपरिच्छदाः ॥ ११ ॥ महाराज कुबेरके आदेशसे क्रोधवश नामक राक्षस, जिनकी संख्या एक लाख थी, विचित्र आयुध और वेशभूषासे सुसज्जित हो उसकी रक्षा करते थे ॥ ११ ॥ ते तु दृष्ट्वैव कौन्तेयमजिनैः प्रतिवासितम् । रुक्माङ्गदधरं वीरं भीमं भीमपराक्रमम् ॥ १२ ॥ सायुधं बद्धनिस्त्रिंशमशङ्कितमरिंदमम् । पुष्करेप्सुमुपायान्तमन्योन्यमभिचुक्रुशुः ॥ १३ ॥ उस समय भयानक पराक्रमी कुन्तीकुमार वीरवर भीम अपने अंगोंमें मृगचर्म लपेटे हुए थे। भुजाओंमें सोनेके अंगद (बाजूबंद) पहन रखे थे। वे धनुष और गदा आदि आयुधोंसे युक्त थे। उन्होंने कमरमें तलवार बाँध रखी थी। वे शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ और निर्भीक थे। उन्हें कमल लेनेकी इच्छासे वहाँ आते देख वे पहरा देनेवाले राक्षस आपसमें कोलाहल करने लगे ॥ अयं पुरुषशार्दूलः सायुधोऽजिनसंवृतः । यच्चिकीर्षुरिह प्राप्तस्तत् सम्प्रष्टुमिहार्हथ ॥ १४ ॥ उनमें परस्पर इस प्रकार बातचीत हुई—'देखो, यह नरश्रेष्ठ मृगचर्मसे आच्छादित होनेपर भी हाथमें आयुध लिये हुए है। यह यहाँ जिस कार्यके लिये आया है, उसे