भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1052, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1052

बहुपुष्पफलं रम्यमाश्रमं वृषपर्वणः ॥ १५ ॥ ‘कुन्तीकुमार! वहाँसे तुम प्रचुर फल-फूलसे सम्पन्न वृषपर्वाके रमणीय आश्रमपर जाओ, जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं ॥ १५ ॥ अतिक्रम्य च तं पार्थ त्वाष्टिषेणाश्रमे वसेः । ततो द्रक्ष्यसि कौन्तेय निवेशं धनदस्य च ॥ १६ ॥ ‘उस आश्रमको भी लाँघकर आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना और वहीं निवास करना। तदनन्तर तुम्हें धनदाता कुबेरके निवासस्थानका दर्शन होगा’ ॥ १६ ॥ एतस्मिन्नन्तरे वायुर्दिव्यगन्धवहः शुचिः । सुखप्रह्लादनः शीतः पुष्पवर्षं ववर्ष च ॥ १७ ॥ इसी समय दिव्य सुगन्धसे परिपूर्ण पवित्र वायु चलने लगी, जो शीतल तथा सुख और आह्लाद देनेवाली थी। साथ ही वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ १७ ॥ श्रुत्वा तु दिव्यमाकाशाद् वाचं सर्वे विसिस्मियुः । ऋषीणां ब्राह्मणानां च पार्थिवानां विशेषतः ॥ १८ ॥ वह दिव्य आकाशवाणी सुनकर सबको बड़ा विस्मय हुआ। ऋषियों, ब्राह्मणों और विशेषतः राजर्षियोंको अधिक आश्चर्य हुआ ॥ १८ ॥ श्रुत्वा तन्महदाश्चर्यं द्विजो धौम्योऽब्रवीत् तदा । न शक्यमुत्तरं वक्तुमेवं भवतु भारत ॥ १९ ॥ वह महान् आश्चर्यजनक बात सुनकर विप्रर्षि धौम्यने कहा—‘भारत! इसका प्रतिवाद नहीं किया जा सकता। ऐसा ही होना चाहिये’ ॥ १९ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा प्रतिजग्राह तद् वचः । प्रत्यागम्य पुनस्तं तु नरनारायणाश्रमम् ॥ २० ॥ भीमसेनादिभिः सर्वैर्भ्रातृभिः परिवारितः । पाञ्चाल्या ब्राह्मणाश्चैव न्यवसन्त सुखं तदा ॥ २१ ॥ तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने वह आकाशवाणी स्वीकार कर ली और पुनः नर-नारायणके आश्रममें लौटकर भीमसेन आदि सब भाइयों और द्रौपदीके साथ वहीं रहने लगे। उस समय साथ आये हुए ब्राह्मण लोग भी वहीं सुखपूर्वक निवास करने लगे ॥ २०-२१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां पुनर्नरनारायणाश्रमागपने षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें पाण्डवोंका पुनः नर-नारायणके आश्रममें आगमनविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५६ ॥

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