महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली स्वरूपको वे नहीं जानते थे ॥ ६ ॥ स भीमसेने निष्क्रान्ते मृगयार्थमरिन्दम । घटोत्कचं सानुचरं दृष्ट्वा विप्रद्रुतं दिशः ॥ ७ ॥ लोमशप्रभृतींस्तांस्तु महर्षींश्च समाहितान् । स्नातुं विनिर्गतान् दृष्ट्वा पुष्पार्थं च तपोधनान् ॥ ८ ॥ रूपमन्यत् समास्थाय विकृतं भैरवं महत् । गृहीत्वा सर्वशस्त्राणि द्रौपदीं परिगृह्य च ॥ ९ ॥ प्रातिष्ठत स दुष्टात्मा त्रीन् गृहीत्वा च पाण्डवान् । सहदेवस्तु यत्नेन ततोऽपक्रम्य पाण्डवः ॥ १० ॥ विक्रम्य कौशिकं खड्गं मोक्षयित्वा ग्रहं रिपोः । आक्रन्दद् भीमसेनं वै येन यातो महाबलः ॥ ११ ॥ शत्रुसूदन! हिंसक पशुओंको मारनेके लिये भीमसेनके आश्रमसे बाहर चले जानेपर उस राक्षसने देखा कि घटोत्कच अपने सेवकोंसहित किसी अज्ञात दिशाको चला गया, लोमश आदि महर्षि ध्यान लगाये बैठे हैं तथा दूसरे तपोधन स्नान करने और फूल लानेके लिये कुटियासे बाहर निकल गये हैं, तब उस दुष्टात्माने विशाल, विकराल एवं भयंकर दूसरा रूप धारण करके पाण्डवोंके सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र, द्रौपदी तथा तीनों पाण्डवोंको भी लेकर वहाँसे प्रस्थान कर दिया। उस समय पाण्डु-कुमार सहदेव प्रयत्न करके उस राक्षसकी पकड़से छूट गये और पराक्रम करके म्यानसे निकली हुई अपनी तलवारको भी उससे छुड़ा लिया। फिर वे महाबली भीमसेन जिस मार्गसे गये थे, उधर ही जाकर उन्हें जोर-जोरसे पुकारने लगे ॥ ७—११ ॥