भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1060, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1060

न मे मूढा दिशः पाप त्वदर्थं मे विलम्बितम् ॥ ४८ ॥ उस समय रोषसे उसके ओठ फड़क रहे थे। उसने भीमसेनको उत्तर देते हुए कहा—'ओ पापी! मुझे दिग्भ्रम नहीं हुआ था। मैंने तेरे ही लिये विलम्ब किया था ॥ ४८ ॥

श्रुता मे राक्षसा ये ये त्वया विनिहता रणे । तेषामद्य करिष्यामि तवास्रेणोदकक्रियाम् ॥ ४९ ॥ 'तूने जिन-जिन राक्षसोंको युद्धमें मारा है, उन सबके नाम मैंने सुने हैं। आज तेरे रक्तसे ही मैं उनका तर्पण करूँगा, ॥ ४९ ॥

एवमुक्तस्ततो भीमः सृक्किणी परिसंलिहन् । स्मयमान इव क्रोधात् साक्षात् कालान्तकोपमः ॥ ५० ॥ (ब्रुवन् वै तिष्ठ तिष्ठेति क्रोधसंरक्तलोचनः ।) बाहुसंरम्भमेवैक्षन्नभिदुद्राव राक्षसम् । राक्षसोऽपि तदा भीमं युद्धार्थिनमवस्थितम् ॥ ५१ ॥ मुहुर्मुहुर्व्याददानः सृक्किणी परिसंलिहन् । अभिदुद्राव संरब्धो बलिर्वज्रधरं यथा ॥ ५२ ॥ राक्षसके ऐसा कहनेपर भीमसेन अपने मुखके दोनों कोने चाटते हुए कुछ मुसकराते-से प्रतीत हुए फिर क्रोधसे साक्षात् काल और यमराजके समान जान पड़ने लगे। रोषसे उनकी आँखें लाल हो गयी थीं 'खड़ा रह,' खड़ा रह कहते हुए ताल ठोंककर राक्षसकी ओर दृष्टि गड़ाये उसपर टूट पड़े। राक्षस भी उस समय भीमसेनको युद्धके लिये उपस्थित देख बार-बार मुँह फैलाकर मुँहके दोनों कोने चाटने लगा और जैसे बलिराजा वज्रधारी इन्द्रपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार कुपित हो उसने भीमसेनपर धावा किया ॥ ५०—५२ ॥

(भीमसेनोऽप्यवष्टब्धो नियुद्धायाभवत् स्थितः । राक्षसोऽपि च विस्रब्धो बाहुयुद्धमकाङ्क्षत ॥ वर्तमाने तदा ताभ्यां बाहुयुद्धे सुदारुणे । माद्रीपुत्रावतिक्रुद्धावुभावप्यभ्यधावताम् ॥ ५३ ॥ भीमसेन भी स्थिर होकर उससे युद्धके लिये खड़े हो गये और वह राक्षस भी निश्चिन्त हो उनके साथ बाहुयुद्धकी इच्छा करने लगा। उस समय उन दोनोंमें बड़ा भयंकर बाहुयुद्ध होने लगा। यह देख माद्रीपुत्र नकुल और सहदेव अत्यन्त क्रोधमें भरकर उसकी ओर दौड़े ॥ ५३ ॥

न्यवारयत् तौ प्रहसन् कुन्तीपुत्रो वृकोदरः । शक्तोऽहं राक्षसस्येति प्रेक्षध्वमिति चाब्रवीत् ॥ ५४ ॥ परंतु कुन्तीकुमार भीमसेनने हँसकर उन दोनोंको रोक दिया और कहा—'मैं अकेला ही इस राक्षसके लिये पर्याप्त हूँ। तुमलोग चुप-चाप देखते रहो' ॥ ५४ ॥

आत्मना भ्रातृभिश्चैव धर्मेण सुकृतेन च ।

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