महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभी उनकी सेवाके लिये पीछे-पीछे चले। राजा युधिष्ठिर महर्षि लोमशके द्वारा सर्वथा सुरक्षित थे ॥ १३-१४ ॥ क्वचित् पद्भ्यां ततोऽगच्छद् राक्षसैरुह्यते क्वचित् । तत्र तत्र महातेजा भ्रातृभिः सह सुव्रतः ॥ १५ ॥ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे महातेजस्वी भूपाल कहीं तो भाइयोंसहित पैदल चलते और कहीं राक्षसलोग उन्हें पीठपर बैठाकर ले जाते थे। इस प्रकार वे अनेक स्थानोंमें गये ॥ १५ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा बहून् क्लेशान् विचिन्तयन् । सिंहव्याघ्रगजाकीर्णामुदीचीं प्रययौ दिशम् ॥ १६ ॥ तदनन्तर राजा युधिष्ठिर अनेक क्लेशोंका चिन्तन करते हुए सिंह, व्याघ्र और हाथियोंसे भरी हुई उत्तर-दिशाकी ओर चल दिये ॥ १६ ॥ अवेक्षमाणः कैलासं मैनाकं चैव पर्वतम् । गन्धमादनपादांश्च श्वेतं चापि शिलोच्चयम् ॥ १७ ॥ उपर्युपरि शैलस्य बह्वीश्च सरितः शिवाः । पृष्ठं हिमवतः पुण्यं ययौ सप्तदशेऽहनि ॥ १८ ॥ कैलास, मैनाकपर्वत, गन्धमादनकी घाटियों और श्वेत (हिमालय) पर्वतका दर्शन करते हुए उन्होंने पर्वतमालाओंके ऊपर-ऊपर बहुत-सी कल्याणमयी सरिताएँ देखीं तथा सत्रहवें दिन वे हिमालयके एक पावन पृष्ठभागपर जा पहुँचे ॥ १७-१८ ॥ ददृशुः पाण्डवा राजन् गन्धमादनमन्तिकात् । पृष्ठे हिमवतः पुण्ये नानाद्रुमलतावृते ॥ १९ ॥ सलिलावर्तसंजातैः पुष्पितैश्च महीरुहैः । समावृतं पुण्यतममाश्रमं वृषपर्वाणः ॥ २० ॥ तमुपागम्य राजर्षिं धर्मात्मानमरिन्दमाः । पाण्डवा वृषपर्वाणमवन्दन्त गतक्लमाः ॥ २१ ॥ राजन्! वहाँ पाण्डवोंने गन्धमादन पर्वतका निकटसे दर्शन किया। हिमालयका वह पावन पृष्ठभाग नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे आवृत्त था। वहाँ जलके आवर्तोंसे सींचकर उत्पन्न हुए फूलवाले वृक्षोंसे घिरा हुआ वृषपर्वाका परम पवित्र आश्रम था। शत्रुदमन पाण्डवोंने उन धर्मात्मा राजर्षि वृषपर्वाके पास जाकर क्लेशरहित हो उन्हें प्रणाम किया ॥ १९—२१ ॥ अभ्यनन्दत् स राजर्षिः पुत्रवद् भरतर्षभान् । पूजिताश्चावसंस्तत्र सप्तरात्रमरिन्दमाः ॥ २२ ॥ उन राजर्षिने भरतकुलभूषण पाण्डवोंका पुत्रके समान अभिनन्दन किया और उनसे सम्मानित होकर वे शत्रुदमन पाण्डव वहाँ सात रात ठहरे रहे ॥ २२ ॥