भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 107

भारत! उस वनमें प्रवेश करते ही वह राक्षस उनका मार्ग रोककर खड़ा हो गया। उसकी आँखें चमक रही थीं। वह भयानक राक्षस मशाल लिये आया था ।। ६ ।।

बाहू महान्तौ कृत्वा तु तथाऽऽस्यं च भयानकम् ।
स्थितमावृत्य पन्थानं येन यान्ति कुरुद्वहाः ।। ७ ।।
अपनी दोनों भुजाओंको बहुत बड़ी करके मुँहको भयानकरूपसे फैलाकर वह उसी मार्गको घेरकर खड़ा हो गया, जिससे वे कुरुवंशशिरोमणि पाण्डव यात्रा कर रहे थे ।। ७ ।।

स्पष्टाष्टदंष्ट्रं ताम्राक्षं प्रदीप्तोर्ध्वशिरोरुहम् ।
सार्करश्मितडिच्चक्रं सबलाकमिवाम्बुदम् ।। ८ ।।
उसकी आठ दाढ़ें स्पष्ट दिखायी देती थीं, आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं एवं सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए और प्रज्वलित-से जान पड़ते थे। उसे देखकर ऐसा मालूम होता था, मानो सूर्यकी किरणों, विद्युन्मण्डल और बकपक्तियोंके साथ मेघ शोभा पा रहा हो ।। ८ ।।

सृजन्तं राक्षसीं मायां महानादनिनादितम् ।
मुञ्चन्तं विपुलान् नादान् सतोयमिव तोयदम् ।। ९ ।।
वह भयंकर गर्जनाके साथ राक्षसी मायाकी सृष्टि कर रहा था। सजल जलधरके समान जोर-जोरसे सिंहनाद करता था ।। ९ ।।

तस्य नादेन संत्रस्ताः पक्षिणः सर्वतोदिशम् ।
विमुक्तनादाः सम्पेतुः स्थलजा जलजैः सह ।। १० ।।
उसकी गर्जनासे भयभीत हुए स्थलचर पक्षी जलचर पक्षियोंके साथ चीं-चीं करते हुए सब दिशाओंमें भाग चले ।। १० ।।

सम्पद्रुतमृगद्वीपिमहिषर्क्षसमाकुलम् ।
तद् वनं तस्य नादेन सम्प्रस्थितमिवाभवत् ।। ११ ।।
भागते हुए मृग, भेड़िये, भैंसे तथा रीछोंसे भरा हुआ वह वन उस राक्षसकी गर्जनासे ऐसा हो गया, मानो वह वन ही भाग रहा हो ।। ११ ।।

तस्योरुवाताभिहतास्ताम्रपल्लवबाहवः ।
विदूरजाताश्च लताः समाश्लिष्यन्ति पादपान् ।। १२ ।।
उसकी जाँघोंकी हवाके वेगसे आहत हो ताम्रवर्णके पल्लवरूपी बाँहोंद्वारा सुशोभित दूरकी लताएँ भी मानो वृक्षोंसे लिपटी जाती थीं ।। १२ ।।

तस्मिन् क्षणेऽथ प्रववौ मारुतो भृशदारुणः ।
रजसा संवृतं तेन नष्टज्योतिर्भून्नभः ।। १३ ।।
इसी समय बड़ी प्रचण्ड वायु चलने लगी। उसकी उड़ायी हुई धूलसे आच्छादित हो आकाशके तारे भी अस्त हो गये-से जान पड़ते थे ।। १३ ।।

पञ्चानां पाण्डुपुत्राणामविज्ञातो महारिपुः ।