भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1098

'नरेश्वर! राक्षसों और यक्षोंमें जो प्रमुख वीर थे, वे आज उत्साहशून्य तथा निष्प्राण होकर रणभूमिमें सो रहे हैं। हमलोग उसके कृपा-प्रसादसे छूट गये हैं; परंतु आपके सखा राक्षस मणिमान् मार डाले गये हैं ॥ १९-२० ॥ मानुषेण कृतं कर्म विधत्स्व यदनन्तरम् । स तच्छ्रुत्वा तु संक्रुद्धः सर्वयक्षगणाधिपः ॥ २१ ॥ कोपसंरक्तनयनः कथमित्यब्रवीद् वचः । 'यह सब कार्य एक मनुष्यने किया है। इसके बाद जो करना उचित हो, वह कीजिये।' राक्षसोंकी यह बात सुनकर समस्त यक्षगणोंके स्वामी कुबेर कुपित हो उठे, क्रोधसे उनकी आँखें लाल हो गयीं। वे सहसा बोल उठे। 'यह कैसे सम्भव हुआ?' ॥ २१ १/२ ॥ द्वितीयमपराध्यन्तं भीमं श्रुत्वा धनेश्वरः ॥ २२ ॥ चुक्रोध यक्षाधिपतिर्युज्यतामिति चाब्रवीत् । भीमने यह दूसरा अपराध किया है, यह सुनकर धनाध्यक्ष यक्षराजके क्रोधकी सीमा न रही। उन्होंने तुरंत आज्ञा दी, 'रथ जोतकर ले आओ' ॥ २२ १/२ ॥ अथाभ्रघनसंकाशं गिरिशृङ्गमिवोच्छ्रितम् ॥ २३ ॥ रथं संयोजयामासुर्गन्धर्वैर्हेममालिभिः । तस्य सर्वगुणोपेता विमलाक्षा हयोत्तमाः ॥ २४ ॥ तेजोबलगुणोपेता नानारत्नविभूषिताः । शोभमाना रथे युक्तास्तरिष्यन्त इवाशुगाः ॥ २५ ॥ फिर तो सेवकोंने सुनहरे बादलोंकी घटाके सदृश विशाल पर्वतशिखरके समान ऊँचा रथ जोतकर तैयार किया। उसमें सुवर्णमालाओंसे विभूषित गन्धर्वदेशीय घोड़े जुते हुए थे। वे सर्वगुणसम्पन्न उत्तम अश्व तेजस्वी, बलवान् और अश्वोचित गुणोंसे युक्त थे। उनकी आँखें निर्मल थीं और उन्हें नाना प्रकारके रत्नमय आभूषण पहनाये गये थे। रथमें जुते हुए वे शोभाशाली अश्व शीघ्रगामी थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो वे अभी सब कुछ लाँघ जायँगे ॥ २३—२५ ॥ ह्रेषयामासुरन्योन्यं ह्रेषितैर्विजयावहैः । स तमास्थाय भगवान् राजराजो महारथम् ॥ २६ ॥ प्रययौ देवगन्धर्वैः स्तूयमानो महाद्युतिः । उन अश्वोंके हिनहिनानेकी आवाज विजयकी सूचना देनेवाली थी। उनमेंसे प्रत्येक अश्व स्वयं हिनहिनाकर दूसरेको भी इसके लिये प्रेरणा देता था। उस विशाल रथपर आरूढ़ हो महातेजस्वी राजाधिराज भगवान् कुबेर देवताओं और गन्धर्वोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए चले ॥ २६ १/२ ॥ तं प्रयान्तं महात्मानं सर्वे यक्षा धनाधिपम् ॥ २७ ॥ धनाध्यक्ष महामना कुबेरके प्रस्थान करनेपर समस्त यक्ष भी उनके साथ चले ॥ २७ ॥