महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1109, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनके पीछे सहस्रों यक्ष और राक्षस भी अपने-अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो चल दिये। उनके वे वाहन नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे और उनकी पीठपर बहुरंगे कम्बल आदि कसे हुए थे॥ ३३॥
पक्षिणामिव निर्घोषः कुबेरसदनं प्रति।
बभूव परमाश्वानामैरावतपथे यथा॥ ३४॥
जैसे इन्द्रपुरीके मार्गपर चलनेवाले विविध वाहनोंका कोलाहल सुनायी पड़ता है, उसी प्रकार कुबेरभवनके प्रति यात्रा करनेवाले उत्तम अश्वोंका शब्द ऐसा जान पड़ता था, मानो पक्षी उड़ रहे हों॥ ३४॥
ते जग्मुस्तूर्णमाकाशं धनाधिपतिवाजिनः।
प्रकर्षन्त इवाभ्राणि पिबन्त इव मारुतम्॥ ३५॥
धनाध्यक्ष कुबेरके वे घोड़े अपने साथ बादलोंको खींचते और वायुको पीते हुए-से तीव्र गतिसे आकाशमें उड़ चले॥ ३५॥
ततस्तानि शरीराणि गतसत्त्वानि रक्षसाम्।
अपाकृष्यन्त शैलाग्राद् धनाधिपतिशासनात्॥ ३६॥
तदनन्तर कुबेरकी आज्ञासे राक्षसोंके वे निर्जीव शरीर उस पर्वतशिखरसे दूर हटा दिये गये॥ ३६॥
तेषां हि शापकालः स कृतोऽगस्त्येन धीमता।
समरे निहतास्तस्माच्छापस्यान्तोऽभवत् तदा॥ ३७॥
पाण्डवाश्च महात्मानस्तेषु वेश्मसु तां क्षपाम्।
सुखमूर्षुर्गतोद्वेगाः पूजिताः सर्वराक्षसैः॥ ३८॥
बुद्धिमान् अगस्त्यने यक्षोंके लिये शापकी वही अवधि निश्चित की थी। जब वे युद्धमें मारे गये तब उनके शापका अन्त हो गया। महामना पाण्डव अपने उन आश्रमोंमें सम्पूर्ण राक्षसोंसे पूजित एवं उद्वेगशून्य होकर सुखसे रात्रि व्यतीत करने लगे॥ ३७-३८॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि कुबेरवाक्ये
द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें कुबेरवाक्यविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६२॥