भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1111

‘तात! सब धर्मोंके ज्ञाता मनीषी महर्षि इस दिशाको देवराज इन्द्र तथा कुबेरका निवासस्थान कहते हैं। इधरसे ही उदित होनेवाले सूर्यदेवकी समस्त प्रजा, धर्मज्ञ ऋषि, सिद्ध महात्मा तथा साध्य देवता उपासना करते हैं ।। ६-७ ।।
यमस्तु राजा धर्मज्ञः सर्वप्राणभृतां प्रभुः ।
प्रेतसत्त्वगतिं ह्येनां दक्षिणामाश्रितो दिशम् ।। ८ ।।
‘समस्त प्राणियोंके ऊपर प्रभुत्व रखनेवाले धर्मज्ञ राजा यम इस दक्षिण दिशाका आश्रय लेकर रहते हैं। इसमें मरे हुए प्राणी ही जा सकते हैं ।। ८ ।।
एतत् संयमनं पुण्यमतीवाद्भुतदर्शनम् ।
प्रेतराजस्य भवनमृद्ध्या परमया युतम् ।। ९ ।।
‘प्रेतराजका यह निवासस्थान अत्यन्त समृद्धिशाली परम पवित्र तथा देखनेमें अद्भुत है। राजन्! इसका नाम संयमन (या संयमनीपुरी) है ।। ९ ।।
यं प्राप्य सविता राजन् सत्येन प्रतितिष्ठति ।
अस्तं पर्वतराजानमेतमाहुर्मनीषिणः ।। १० ।।
एतं पर्वतराजानं समुद्रं च महोदधिम् ।
आवसन् वरुणो राजा भूतानि परिरक्षति ।। ११ ।।
‘राजन्! जहाँ जाकर भगवान् सूर्य सत्यसे प्रतिष्ठित होते हैं, उस पर्वतराजको मनीषी पुरुष अस्ताचल कहते हैं। गिरिराज अस्ताचल और महान् जलराशिसे भरे हुए समुद्रमें रहकर राजा वरुण समस्त प्राणियोंकी रक्षा करते हैं ।। १०-११ ।।
उदीचीं दीपयन्नेष दिशं तिष्ठति वीर्यवान् ।
महामेरुर्महाभाग शिवो ब्रह्मविदां गतिः ।। १२ ।।
‘महाभाग!’ यह अत्यन्त प्रकाशमान महामेरु पर्वत दिखायी देता है, जो उत्तर दिशाको उद्भासित करता हुआ खड़ा है। इस कल्याणकारी पर्वतपर ब्रह्मवेत्ताओंकी ही पहुँच हो सकती है ।। १२ ।।
यस्मिन् ब्रह्मसदश्चैव भूतात्मा चावतिष्ठते ।
प्रजापतिः सृजन् सर्वं यत् किञ्चिज्जङ्गमागमम् ।। १३ ।।
‘इसीपर ब्रह्माजीकी सभा है, जहाँ समस्त प्राणियोंके आत्मा ब्रह्मा स्थावर-जंगम समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करते हुए नित्य निवास करते हैं ।। १३ ।।
यानाहुर्ब्रह्मणः पुत्रान् मानसात् दक्षसप्तमान् ।
तेषामपि महामेरुः शिवं स्थानमनामयम् ।। १४ ।।
‘जिन्हें ब्रह्माजीका मानसपुत्र बताया जाता है और जिनमें दक्षप्रजापतिका स्थान सातवाँ है। उन समस्त प्रजापतियोंका भी यह महामेरु पर्वत ही रोग-शोकसे रहित सुखद स्थान है ।। १४ ।।
अत्रैव प्रतितिष्ठन्ति पुनरेवोदयन्ति च ।

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