महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1113, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंयतयस्तत्र गच्छन्ति भक्त्या नारायणं हरिम् ॥ २३ ॥ 'साक्षात् अचिन्त्यस्वरूप भगवान् विष्णु ही वहाँ विराजित होते हैं। यत्नशील महात्मा भक्तिके प्रभावसे वहाँ भगवान् नारायणको प्राप्त होते हैं ॥ २३ ॥
परेण तपसा युक्ता भाविताः कर्मभिः शुभैः । योगसिद्धा महात्मानस्तमोमोहविवर्जिताः ॥ २४ ॥ तत्र गत्वा पुनर्नेमं लोकमायान्ति भारत । स्वयम्भुवं महात्मानं देवदेवं सनातनम् ॥ २५ ॥ 'भारत! जो उत्तम तपस्यासे युक्त हैं और पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे पवित्र हो गये हैं, वे अज्ञान और मोहसे रहित योगसिद्ध महात्मा उस नारायण-धाममें जाकर फिर इस संसारमें नहीं लौटते हैं। अपितु स्वयंभू एवं सनातन परमात्मा देवदेव विष्णुमें लीन हो जाते हैं ॥ २४-२५ ॥
स्थानमेतन्महाभाग ध्रुवमक्षयमव्ययम् । ईश्वरस्य सदा ह्येतत् प्रणमात्र युधिष्ठिर ॥ २६ ॥ 'महाभाग युधिष्ठिर! यह परमेश्वरका नित्य, अविनाशी और अविकारी स्थान है। तुम यहींसे इसको प्रणाम करो ॥ २६ ॥
एनं त्वहरहर्मेरुं सूर्याचन्द्रमसौ ध्रुवम् । प्रदक्षिणमुपावृत्य कुरुतः कुरुनन्दन ॥ २७ ॥ ज्योतींषि चाप्यशेषेण सर्वाण्यनघ सर्वतः । परियान्ति महाराज गिरिराजं प्रदक्षिणम् ॥ २८ ॥ 'कुरुनन्दन! सूर्य और चन्द्रमा प्रतिदिन इस निश्चल मेरुगिरिकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं। पापशून्य महाराज! सम्पूर्ण नक्षत्र भी गिरिराज मेरुकी सर्वतोभावेन परिक्रमा करते हैं ॥ २७-२८ ॥
एतं ज्योतींषि सर्वाणि प्रकर्षन् भगवानपि । कुरुते वितमस्कर्मा आदित्योऽभिप्रदक्षिणम् ॥ २९ ॥ 'अन्धकारका निवारण करना ही जिनका मुख्य कर्म है, वे भगवान् सूर्य भी सम्पूर्ण ज्योतियोंको अपनी ओर खींचते हुए इस मेरुगिरिकी प्रदक्षिणा करते हैं ॥ २९ ॥
अस्तं प्राप्य ततः संध्यामतिक्रम्य दिवाकरः । उदीचीं भजते काष्ठां दिशमेष विभावसुः ॥ ३० ॥ स मेरुमनुवृत्तः सन् पुनर्गच्छति पाण्डव । प्राङ्मुखः सविता देवः सर्वभूतहिते रतः ॥ ३१ ॥ 'तदनन्तर अस्ताचलको पहुँचकर संध्याकालकी सीमाको लाँघकर ये भगवान् सूर्य उत्तर दिशाका आश्रय लेते हैं। पाण्डुनन्दन! मेरु पर्वतका अनुसरण करके उत्तर दिशाकी