महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1116, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंकी अर्जुनके लिये उत्कण्ठा और अर्जुनका आगमन
वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् नगेन्द्रे वसतां तु तेषां महात्मनां सद्व्रतमास्थितानाम् । रतिः प्रमोदश्च बभूव तेषा- माकाङ्क्षतां दर्शनमर्जुनस्य ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस पर्वतराज गन्धमादनपर उत्तम व्रतका आश्रय ले निवास करते हुए अर्जुनके दर्शनकी इच्छा रखनेवाले महामना पाण्डवोंके मनमें अत्यन्त प्रेम और आनन्दका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १ ॥
तान् वीर्ययुक्तान् सुविशुद्धकामां- स्तेजस्विनः सत्यधृतिप्रधानान् । सम्प्रीयमाणा बहवोऽभिजग्मु- र्गन्धर्वसङ्घाश्च महर्षयश्च ॥ २ ॥
वे सब-के-सब बड़े पराक्रमी थे। उनकी कामनाएँ अत्यन्त विशुद्ध थीं। वे तेजस्वी तो थे ही, सत्य और धैर्य उनके प्रधान गुण थे; अतः बहुतसे गन्धर्व तथा महर्षिगण उनसे प्रेमपूर्वक मिलने-जुलनेके लिये आने लगे ॥ २ ॥
तं पादपैः पुष्पधरैरुपेतं नगोत्तमं प्राप्य महारथानाम् । मनःप्रसादः परमो बभूव यथा दिवं प्राप्य मरुद्गणानाम् ॥ ३ ॥
वह श्रेष्ठ पर्वत विकसित वृक्षावलियोंसे विभूषित था। वहाँ पहुँच जानेसे महारथी पाण्डवोंके मनमें बड़ी प्रसन्नता रहने लगी। ठीक उसी तरह, जैसे मरुद्गणोंको स्वर्गलोकमें पहुँचनेपर प्रसन्नता होती है ॥ ३ ॥
मयूरहंसस्वननादितानि पुष्पोपकीर्णानि महाचलस्य । शृङ्गाणि सानूनि च पश्यमाना गिरेः परं हर्षमवाप्य तस्थुः ॥ ४ ॥