भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1135

परंतु उस महान् तेजस्वी वीरने क्षणभरमें ही मेरे उस ब्रह्मास्त्रको भी शान्त कर दिया। राजन्! उस ब्रह्मास्त्रके नष्ट होनेपर मेरे मनमें महान् भय समा गया ।।

ततोऽहं धनुरादाय तथाक्षय्ये महेषुधी ।
सहसाभ्यहनं भूतं तान्यप्यस्त्राण्यभक्षयत् ॥ ३८ ॥

तब मैं धनुष और दोनों अक्षय तरकस लेकर सहसा उस दिव्य पुरुषपर आघात करने लगा, किंतु उसने उन सबको भी अपना आहार बना लिया ।। ३८ ।।

हतेष्वस्त्रेषु सर्वेषु भक्षितेष्वायुधेषु च ।
मम तस्य च भूतस्य बाहुयुद्धमवर्तत ॥ ३९ ॥

जब मेरे सारे अस्त्र-शस्त्र नष्ट होकर उसके आहार बन गये, तब मेरा उस अलौकिक प्राणीके साथ मल्लयुद्ध प्रारम्भ हो गया ।। ३९ ।।

व्यायामं मुष्टिभिः कृत्वा तलैरपि समागतैः ।
अपारयंश्च तद् भूतं निश्चेष्टमगमं महीम् ॥ ४० ॥
ततः प्रहस्य तद् भूतं तत्रैवान्तरधीयत ।
सह स्त्रीभिर्महाराज पश्यतो मेऽद्भुतोपमम् ॥ ४१ ॥

पहले मुक्कों और थप्पड़ोंसे मैंने उससे टक्कर लेनेकी चेष्टाकी, परंतु उसपर मेरा कोई वश नहीं चला और मैं निश्चेष्ट होकर पृथिवीपर गिर पड़ा। महाराज! तब वह अलौकिक प्राणी हँसकर मेरे देखते-देखते स्त्रियोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गया ।। ४०-४१ ।।

एवं कृत्वा स भगवांस्ततोऽन्यद् रूपमास्थितः ।
दिव्यमेव महाराज वसानोऽद्भुतमम्बरम् ॥ ४२ ॥
हित्वा किरातरूपं च भगवान्स्त्रिदशेश्वरः ।
स्वरूपं दिव्यमास्थाय तस्थौ तत्र महेश्वरः ॥ ४३ ॥

राजन्! वास्तवमें वे भगवान् शंकर थे। उन्होंने पूर्वोक्त बर्ताव करके दूसरा रूप धारण कर लिया। देवताओंके स्वामी भगवान् महेश्वर किरातरूप छोड़कर दिव्य स्वरूपका आश्रय ले अलौकिक एवं अद्भुत वस्त्र धारण किये वहाँ खड़े हो गये ।। ४२-४३ ।।

अदृश्यत ततः साक्षाद् भगवान् गोवृषध्वजः ।
उमासहायो व्यालधृग् बहुरूपः पिनाकधृक् ॥ ४४ ॥
स मामभ्येत्य समरे तथैवाभिमुखं स्थितम् ।
शूलपाणिरथोवाच तुष्टोऽस्मीति परंतप ॥ ४५ ॥

इस प्रकार उमासहित साक्षात् भगवान् वृषभ-ध्वजका दर्शन हुआ। उन्होंने अपने अंगोंमें सर्प और हाथमें पिनाक धारण कर रखे थे। अनेक रूपधारी भगवान् शूलपाणि उस रणभूमिमें मेरे निकट आकर पूर्ववत् सामने खड़े हो गये और बोले—'परंतप! मैं तुमपर संतुष्ट हूँ' ।। ४४-४५ ।।

ततस्तद् धनुरादाय तूणौ चाक्षय्यसायकौ ।