भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 115

हिडिम्बबकयोः पाप न त्वमश्रुप्रमार्जनम् । करिष्यसि गतश्चापि यमस्य सदनं प्रति ॥ ६६ ॥ 'ओ पापी! अब तू यमलोकमें जाकर भी हिडिम्ब और बकासुरके आँसू न पोंछ सकेगा' ॥ ६६ ॥

इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीर- स्तं राक्षसं क्रोधपरीतचेताः । विस्रस्तवस्त्राभरणं स्फुरन्त- मुद्भ्रान्तचित्तं व्यसुमुत्ससर्ज ॥ ६७ ॥ ऐसा कहकर क्रोधसे भरे हृदयवाले नरवीर भीमने उस राक्षसको, जिसके वस्त्र और आभूषण खिसककर इधर-उधर गिर गये थे और चित्त भ्रान्त हो रहा था, प्राण निकल जानेपर छोड़ दिया ॥ ६७ ॥

तस्मिन् हते तोयदतुल्यरूपे कृष्णां पुरस्कृत्य नरेन्द्रपुत्राः । भीमं प्रशस्याथ गुणैरनेकै- र्हृष्टास्ततो द्वैतवनाय जग्मुः ॥ ६८ ॥