महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ
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हिडिम्बबकयोः पाप न त्वमश्रुप्रमार्जनम् । करिष्यसि गतश्चापि यमस्य सदनं प्रति ॥ ६६ ॥ 'ओ पापी! अब तू यमलोकमें जाकर भी हिडिम्ब और बकासुरके आँसू न पोंछ सकेगा' ॥ ६६ ॥
इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीर- स्तं राक्षसं क्रोधपरीतचेताः । विस्रस्तवस्त्राभरणं स्फुरन्त- मुद्भ्रान्तचित्तं व्यसुमुत्ससर्ज ॥ ६७ ॥ ऐसा कहकर क्रोधसे भरे हृदयवाले नरवीर भीमने उस राक्षसको, जिसके वस्त्र और आभूषण खिसककर इधर-उधर गिर गये थे और चित्त भ्रान्त हो रहा था, प्राण निकल जानेपर छोड़ दिया ॥ ६७ ॥
तस्मिन् हते तोयदतुल्यरूपे कृष्णां पुरस्कृत्य नरेन्द्रपुत्राः । भीमं प्रशस्याथ गुणैरनेकै- र्हृष्टास्ततो द्वैतवनाय जग्मुः ॥ ६८ ॥